संसार के अधिकांश लोग परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकारते हैं। इसमें समस्त आस्तिक मतों को यह स्वीकार की है कि इस संसार का बनाने वाला एक ही परमात्मा है। उसका नाम अलग-अलग है और वही इस सृष्टि में समस्त जीवो को उनके कर्मों के अनुसार ही फल देता है। इस संसार में हम जैसे कर्म करेंगे वैसा ही शुभ अशुभ फल के रूप में हमें सुख और दुख भोगना ही पड़ेगा। उससे हम बच नहीं सकते। किन्तु वेदांत के अतिरिक्त सभी अवैदिक मतों का यह मत है कि ईश्वर अलग है और वह जीवो को कर्मों के अनुसार फल देता है। लेकिन वेदांत कहता है कि एक ही तत्व जो अनादि है। अनादि का अर्थ हुआ कि वह किसी से पैदा नहीं हुआ और कभी पैदा नहीं हुआ। उसकाे पैदा करने वाला कोई मां बाप नहीं है। वह अनादि तत्व ही अकाल पुरुष कहलाता है। जिसका तात्पर्य है कि वह कभी मरने वाला भी नहीं है। न वह किसी से पैदा हुआ है और न वह मरने वाला है। इसीलिए वेदांती लोग डंके की चोट पर कहते हैं कि “न माता पिता बंधु कोई है मेरा सभी भूत प्राणी का कारण शिवोहम।”
वह अकाल पुरुष अनादि ही नहीं अनंत एवं अक्षर भी है। अनंत का तात्पर्य हुआ कि वह हर जगह है। इससे हम कह सकते हैं कि वह देश परछिन्न नहीं है। यानी वह ऐसा नहीं है कि भारत में है और अमेरिका में नहीं अथवा अफ्रीका में नहीं, पृथ्वी पर है आकाश में नहीं या भूमि पर नहीं जल में नहीं। वह वस्तु परछिन्न भी नहीं है जिसका तात्पर्य होता है कि जो संसार की प्रत्येक वस्तु चाहे वो मनुष्य, पशु-पक्षी, आदि के शरीर हो, नदी, पहाड़, पेड़, पत्थर, आदि हो सभी में वह परमात्मा व्यापक है अथवा जो कुछ भी इस सृष्टि में प्रतीत हो रहा है वह सब परमात्मा में ही है और सब में परमात्मा है। पिछले अवतरणों में यह बात स्पष्ट कर दी गयी है कि वेदांत की व्यापकता ऐसी नहीं है कि लोहे के गोले को अग्नि में डालने पर लोहे में अग्नि व्यापक होकर वह जलाने लगती है। लेकिन वेदांत की व्यापकता ऐसी है कि जैसे औज़ार क्यों न हो चाहे वह चमीटा हो या कढ़ाई हो अथवा हथोड़ी हो चाहें लोहा काटने वाली छैनी हो लोहा सब में व्यापक है। हथियारों में भेद है लोहे में कोई भेद नहीं लोहा सबमे एक है। इस प्रकार से सारी सृष्टि एक अक्षर तत्व में व्यापक है। वह अक्षर तत्व ही अकाल पुरुष है। पुरुष कहने का तात्पर्य यह है कि यह शरीर रुपी नगर में आत्मा के रूप में प्रत्येक जीव में विद्यमान है।
स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज
Nice information
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