वेदान्त दर्शन भाग-4

इस सृष्टि के मूल में केवल एक ही तत्व है। तत्व शब्द दो शब्दों से मिलकर बनता है। पहला “तत” इसका अर्थ होता है “वह” यानी मैं के अतिरिक्त जो कुछ भी जानने में आ रहा है वह सब। इसी को गीता में इदम कहा है। इदम यानी यह सब जो कुछ जानने में आ रहा है। इसी प्रकार से यह और वह सर्वनामों के रूप में जो कुछ भी जानने में आ रहा है वह सब “तत” है और प्रत्येक प्राणी के अंदर जो आत्मा के रूप में अथवा मैं के रूप में जाना जा रहा है वह “त्वम्” है। इस प्रकार से “तत” और “त्वम्” की संधि करने पर व्याकरण के अनुसार “तत्व” शब्द निर्मित होता है। सारी सृष्टि में यह-वह व मैं जो भी जानने में आ रहा है वह एक ही अद्वैत तत्व है। दूसरा कुछ भी नहीं है। वह तत्व ही सत्य है और वही चैतन्य यानी जाननेवाला है।

यह जानने का गुण अंतःकरण के ही माध्यम से होता है। अंतःकरण चतुर्मुखी है, इसमें प्रमुख मन है। मन का काम संकल्प करना है। इसलिए यह चंचल भी है। मन का ही दूसरा रूप बुद्धि है, जिसका निश्चय करना है। बिना बुद्धि के निश्चय किये शरीर की कोई इंद्री काम नहीं करती। इसीलिए मन पर नियंत्रण बुद्धि रहता है। तीसरा करण अहंकार है, जिसमे करता भाव प्रमुख होता है। मनुष्य जीवन में इसकी प्रधानता होती है। मनुष्य जब अपने को करता मानकर किसी कार्य को करता है तो वह उसका भोगता हो जाता है। चौथी इंद्री चित्त मानी जाती है, जिससे जीव में कुछ करने की प्रेरणा होती है। किसी भी दृष्य अथवा शब्द की ओर आकर्षण चित्त का ही होता है। इस प्रकार से चेतना के शरीर में अंतःकरण के रूप में यह चारों (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) रूप ही अंतःकरण कहलाते हैं। वास्तव में मन का ही रूप बुद्धि, अहंकार, आदि हैं। इसलिए भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा है कि “इन्द्रीओं, मैं मन में हूँ”

परमात्मा अपने को प्रगट(जनाना) करना चाहता था, लेकिन कोई दूसरा हो तो उसको जनाए। इसलिए उसने इस सृष्टि की रचना की जिससे वह अपने आप से अपने आप को जना रहा है और वह सृष्टि के रूप में प्रगट हुआ। वेद में वर्णन आया है कि उसने सर्वप्रथम घोड़ा, गाय, आदि जीवों की रचना की लेकिन उसे संतोष नहीं हुआ। जब उसने मनुष्य की रचना की तब उसे प्रशन्नता हुई। उसकी प्रशन्नता का मुख्य कारण यह था कि उसमें बुद्धि की प्रधानता थी। वह अपनी बुद्धि के बल पर विचार के द्वारा सृष्टि के लेकर प्रकृति की रचना को जानने में समर्थ होकर उसके स्वभाव से लाभ उठा सकता है तथा विचार करके परमात्मा से एक होकर शान्त भाव से जैसे गंगा समुद्र में मिलकर समुद्र ही हो जाती है, वह स्वम परमात्मा स्वरुप हो सकता है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

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