वेदान्त ? भाग-1

सृष्टि के प्रारम्भ से ही बुद्धिवादी मनुष्य के लिए सृष्टि के मूल की जिज्ञासा रही है। सम्पूर्ण विश्व में ये प्रश्न सदैव से रहा है। इस संसार में सबसे प्राचीन संस्कृति लगभग २ अरब वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति है और यह आज भी विश्व को अपनी प्रतिभा से प्रकाशित कर रही है। भारतीय दर्शन को विद्यावान आदर की दृष्टि से देखते हैं। भारतीय दर्शन के मुनि ऋषियों ने सृष्टि के मूल में चेतन को पाया है। जबकि पाश्चात दार्शनिकों ने सृष्टि के मूल को जड़ में तलाशा है इसलिए दोनों के परिणाम भी भिन्न-भिन्न आये हैं। एक ने प्रारम्भ से अभी तक को विकासवाद की संज्ञा दी है और वह अमीबा से विकसित होते-होते बन्दर तक पहुंचा, बन्दर के विकास से मनुष्य तक का विकास हुआ और पाषाढ़ काल से विकसित होते-होते परमाणुबाद तक पहुंचे। यह सब मनुष्य ने अपने सुखी होने का मार्ग प्रशस्त्र किआ और हमारी सोच या तो अपने को सुखी बनाने की अथवा अपने को दूसरों से सुरक्षित बनाने के लिए ही रही। इसी का नाम विज्ञानबाद है।

भारतीय दर्शनों में ऐसे दार्शनिकों को चार्वाक नाम से जाना जाता है और ऐसा दर्शन शरीर को ही प्राथमिकता देता है और उसका लक्ष्य केवल अपना जीवन सुख से बिताना है। चार्वाक का सिद्धान्त वाक्या है “ऋणम कृत्वा घृतम पिवेत” ऐसी सोच तो पशु की भी होती है। भारतीय दार्शनिक इसको मनुष्य रूप में पशुवृत्ति ही कहता है।

इस विश्व में अधिकांश आबादी ईश्वरवादी है। ईश्वरवादी विचारकों का सोचना है कि इस सृष्टि के मूल में चैतन्य है और उसी के द्वारा यह सृष्टि अनादिकाल से चल रही है और वही हमारे शुभ-अशुभ कर्मों का साक्षी है एवं हमारे कर्मों के अनुसार वह हमें फल देता है। शुभ कर्मों का फल हमारे जीवन में सुख और अशुभ कर्मों का फल दुःख आता है। ईश्वरवादी धर्म सम्प्रदाओं में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई एवं पारसी आते हैं।

भारतीय दर्शन को हम सनातन धर्म के नाम से जानते हैं। सनातन धर्म में वैष्णव, शैव्य, शाक्त, आदि सभी सम्प्रदाय आते हैं। वेदान्त कहते किसे हैं इस बात पर विचार करो। वेदान्त का अर्थ है वेद का सिरो भाग यानी वेदों का सार और इसे वेदों का अंतिम भाग भी कहते सकते हैं। जिससे समस्त वेदनाओं का अन्त हो जाए। प्रत्येक मनुष्य तथा अन्य जीव भी सभी सुख चाहते हैं। उसे संसार के किसी भी कार्य से सुख की आशा तो रहती है एवं उसके प्रयास में लगा भी रहता है लेकिन तृप्ति नहीं होती। जैसे अगर घर में साइकिल है तो जब तक साइकिल नहीं थी तब तक उसको पाने का प्रयास था। जब साइकिल मिल गयी तो उससे कुछ दिनों तक सन्तोष रहा उसके बाद मोटरसाइकिल की चाह बड़ी और यह चाह कभी समाप्त नहीं होती। वासना बढ़ती ही जाती है। इन कामनाओ का अन्त केवल वैराग्य से ही होता है और वैराग्य बिना विवेक के नहीं आता। जब मनुष्य यह विचार करता है कि क्या हम बार-बार कर्म करें और उनका फल भोगें और वासना के अनुसार पुनः जन्म ले और पुनः कर्म करें। यह चक्र कभी बंद भी होगा क्या? तब वह सत्य को जानने का प्रयास करता है। इसी का नाम विवेक है। जब वह विवेक करता है तो वह इस सृष्टि में दो ही चीजें पाता है। एक सदैव रहने वाला सत्य जो अनंत है और सर्वत्र है और आनंदस्वरूप है, वही शांतिस्वरूप है। उसी में जल में वर्फ के सदृश्य सारी सृष्टि व्याप रही है। चूँकि वह सर्बत्र है तो वह हमारे अंदर भी है और वह हमारे अंदर आत्मा के रूप में व्याप्त है। उसी का नाम ईश्वर है और शरीर रुपी नगर में रहने के कारण उसको मनुष्य कहते हैं। सारे मनुष्यों में व्यापक चैतन्य एक ही है। वह ईश्वर जिसे ईश्वरबादी सृष्टि का करता एवं भोगता मानते हैं, वह हमसे दूर नहीं। हमारी आत्मा के रूप में वह सदैव हमें देख रहा है। हमारी प्रत्येक क्रिया का जानने वाला है। वही हमारा अपना आपा मैं है एवं इस विचारधारा का नाम ही वेदान्त है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

One thought on “वेदान्त ? भाग-1

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.