वेदांत दर्शन-15

ब्रह्म जोकि अनादि,अनंत है एवं यह तुरीय तत्व है अर्थात यह किसी से पैदा नहीं हुआ यानी यह अनादि है। जो चीज अनादि होती है वह अनंत भी होती है इसलिए यह अकाल कहलाता है। इस सृष्टि की प्रत्येक वस्तु उसी में सोने में जेवर की तरह प्रतीत हो रही है। जैसे जेवर में सोना ही सोना होता है। जीवन एक आकृति मात्र देखने में ही आता है। इसी तरह से सारी सृष्टि में ब्रह्म ही है दूसरे शब्दों में यह सृष्टि ब्रह्म का शरीर है। जहां पर हम किसी वस्तु का अपनी इंद्रियों से अनुभव करते हैं उन वस्तुओं में भी वह ब्रह्म है और जहां आकाश है वहां भी वही है इसीलिए उसका नाम आकाशवत् आकाश से भी सूक्ष्म जिसमें निराकार भी एक आकार ही है। वह एक सर्वव्यापी अनादि अनंत तत्व है जिस तत्व तक ना पहुंचने के कारण महात्मा गौतम बुद्ध ने शून्य माना। ईश्वर वादी दार्शनिकों ने ईश्वर कहा। शंख वादियों एवं वेदों ने उसे ब्रह्म कहा है वही सत्य है। वह समस्त शरीरों में आकाशवत् रहने के कारण आत्मा कहलाता है। जैसे हमारा शरीर सृष्टि में वायु अग्नि आदि तत्वों से एक हो रहा है उसी प्रकार हम उस तुरीय तत्व से एक हो रहे हैं। जैसे समुद्र की कोई भी छोटी बड़ी लहर समुद्र के शरीर जल्द से अलग नहीं है इसी प्रकार से हम ब्रह्म से अलग नहीं है। यह ब्रह्म आत्मा के रूप में सब शरीरों में व्यापक है। यह जड़ नहीं है। चैतन्य एवं स्वयं प्रकाश तत्व है। इसके प्रकाश से प्रकाशित होने वाला अंतः करण यानी मन,बुद्धि,अहंकार है। इसी का प्रकाश हमारी ज्ञानेंद्रियों एवं कर्म इंद्रियों पर है। हमारे शरीर की सारी रचना इसी आभाषिक चैतन्य का कारी है। जिसका यह कारी है वह परमात्मा का स्वभाव होने से प्रकृति कहलाती है। जैसे हमारी छाया जो कि प्रकाश से बनती है हमसे अलग नहीं है। हमारे बगैर छाया हो भी नहीं सकती। उस छाया में हम ही सत्य हैं। हम से उसका कोई प्रयोजन नहीं है तथा हम उसके कर्ता भोक्ता भी नहीं है फिर भी वह हमारा ही स्वरूप है। इस प्रकार से हम अकर्ता, अभोक्ता होते हुए भी सब में व्यापक बने हुए हैं। चेतना केवल शरीरों में ही प्रकट होती है। इसी चेतना का नाम आत्मा है। ब्रह्म अनादि अनंत होने के कारण प्रकृति भी अनादि, अनंत व अव्यय है।

हमारे शरीर में जब हम सुषुप्ति में होते हैं तब इस ब्रह्म से एक होते हैं। जैसे ही निद्रा टूटती है उस समय हम अव्यक्त से व्यक्त होते हैं तब हमारा नाम मह तत्व हो जाता है। यह महतत्व सर्वव्यापी है। हमारे शरीर में इसे बुद्धि कहते हैं। सारे संकल्प इसी में होते हैं संकल्पों के कारण मन कहलाती है। मैं पना करने के कारण यह अहंकार कहलाती है। चेतना फुरने का नाम चित् है। इस प्रकार से यह पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश एवं मन बुद्धि अहंकार के रूप में हमारी अष्टधा प्रकृति की रचना यह सृष्टि है। यह रचना प्रकृति में उपस्थित 3 गुण सतोगुण रजोगुण तथा तमोगुण का कारी है। इसीलिए इसका नाम अष्टधा प्रकृति है। इसीलिए अध्यात्म रामायण में जब राम ने सीता की ओर इशारा किया कि हनुमानजी अपने निस्वार्थ सेवक हैं यह ज्ञान के अधिकारी हैं। इनको ज्ञान दो तब सीता ने कहा कि सारी सृष्टि मैं करती हूं आरोप राम में किया जाता है। स्मरण रहे कि राम कौन है राम सर्वव्यापी सब में रमने वाले चैतन्य है। सीता प्रकृति जगत जननी है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

वेदांत दर्शन भाग-14

परमात्मा सत्य है। यानी इस सृष्टि में केवल वही है। यह सारा विश्व उसका ही चमत्कार यानी उसी की महिमा का प्रकाश है। वह चेतन है। यानी वह सर्वज्ञ है। सब उसी से चल रहा है। कैसे यह संसार वह संचालित करता है और इस संसार में जिसकी सत्ता के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता है उस की प्रशासनिक व्यवस्था के विचार का नाम ही दर्शन है। उसकी वैज्ञानिक विचार का ही नाम दर्शनशास्त्र है। जिसके अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग नाम है इंग्लिश भाषा में उसको फिलॉस्फी कहते हैं। भारतीय दर्शन की जड़ें 1955885120 वर्ष पुरानी है। भारतीय मनुषी(जो मन का ईष (मालिक) है, जो मन की अधीन ना हो करके मन से सेवक की तरह अपनी सेवा तो लेता है लेकिन वह कभी उसके अधीन नहीं होता अर्थात जो अपनी बुद्धि के द्वारा मन को घोड़े की लगाम की तरह अपने हाथ में रखता है।) ने दर्शनशास्त्र का विचार आरण्य अर्थात वनों (जहां पर किसी प्रकार का रण अर्थात द्वंद यानी संसार के झंझट ना हो) मे किया। इसीलिए इन उपनिषदों को आरण्यक भी कहा जाता है। गीता जो महाभारत जैसे बहुत बड़े महायुद्ध में मोह के वश हुए अर्जुन जैसे योद्धा को श्री कृष्ण जैसे जोकि साक्षात परमात्मा के अवतार थे गुरु ने सुनाई और उसको अंत में कहना पड़ा की मेरा मोह नष्ट हो गया है (नष्टोमोह) और मुझे अपने स्वरूप का ज्ञान हो गया है। अब मैं आपके वचनों का पालन करूंगा। यह अपवाद के रूप में है गीता को कुछ विद्वान स्मृति ग्रंथ कहते हैं एवं कुछ लोग इसे अंतिम उपनिषद भी कहते हैं। अधिकांशतः गीता की मान्यता एक स्मृति ग्रंथ के रूप में ही है और यह प्रस्थानत्रे का मुख्य ग्रंथ है। प्रस्थानत्रे मैं ब्रह्म सूत्र उपनिषद और गीता प्रधान है।

भारतीय दर्शन के अनुसार परमात्मा जिसे हम सच्चिदानंद कहते हैं वह सृष्टि के समस्त जीवो में आत्मा के रूप में आकाशवत् व्यापक है। यह व्यापकता जैसा कि पहले कहा जा चुका है जेवर में सोने की तरह होती है। परमात्मा का प्रकाश प्रकृति के कार्य अंतः करण में पड़ता है यह अंतःकरण ही पिछले दृष्टांत में बताया गया मिरर है। इस अंतः करण से ही प्रतिबिंबित होकर यह बुद्धि के रूप में प्रतिभाषित होकर के सारा व्यवहार करता है। इस व्यवहार को अज्ञानी जीव मनुष्य अपनी बुद्धि का चमत्कार मानता है और समझदार मनुष्य इसे परमात्मा की कृपा मानता है जो परमात्मा की कृपा मानता है वह भक्त है। जो अपनी आत्मा को परमात्मा स्वरुप अनुभव करता है, वह ज्ञानी है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

 

वेदांत दर्शन भाग-13

श्रुति भवति का कथन है कि यह आत्मा ही ब्रह्म है। श्रुति ज्ञान को अपना अनुभव बना लेती है। यह संसार ब्रह्म चैतन्य में प्रतीति मात्र है। संत महापुरुष उदाहरणों के द्वारा समझाया करते हैं जैसे एक बार कुछ चिड़िया दाना चुग रही थी उसी समय एक शरारती बालक एक शीशा (मिरर) लेकर आया और उसने वह शीशा इस तरह से घुमाया सूर्य की रोशनी शीशे पर पड़े तथा उसकी परछाई को उसने पक्षियों पर डाला और उस परछाई से पक्षी भाग गए। पक्षियों ने भागकर आपस में विचार किया कि हमें किसने भगाया। किसी ने कहा कि बालक ने भगाया किसी ने कहा सूरज की रोशनी ने भगाया। उन पक्षियों में एक बूढ़ा पक्षी जो कि अनुभवी था उसने कहा कि ना तो बालक ने भगाया क्योंकि ना तो बालक ने ताली बजाई और ना ही बालक ने कोई हमें पत्थर लाठी मारी फिर भी हम भागे। इसी प्रकार सूर्य की सीधी रोशनी भी हमारे ऊपर नहीं आई हम धूप में भी नहीं थे फिर भी हमारे ऊपर रोशनी की चमक पड़ी। उसी चमक से हमें भागना पड़ा। यह परछाई कहां से आई? वास्तव में सूर्य की परछाई शीशे पर पड़ी और उस पर छाई का बालक निमित्त बना और उस परछाई के द्वारा ही हमें भागना पड़ा। इसमें सूर्य को किसी प्रकार का कोई प्रयोजन ही नहीं वह पूर्ण रूपेण अकर्ता ही है।

उपरोक्त उदाहरण पर विचार करें तो हमारी आत्मा जो आकाशवत हमारे अंदर है। वह आकाश से भी सूक्ष्म है। जैसे सब आकाश में ही प्रतीत हो रही है उसी प्रकार आकाश की भांति ब्रह्म से एक है। वह ब्रह्म हमारे अंदर आत्मा के नाम से जाना जाता है। आत्मा अकर्ता है इसलिए इसको कूटस्थ कहा है। यह चैतन्य है जाना इसका स्वभाव है। यह स्वयं प्रकाश है। जैसे हीरा स्वयं प्रकाश होता है अथवा सूर्य स्वयं प्रकाशित हो रहा है। इसी प्रकार आत्मा सबके अंदर स्वयं प्रकाश साक्षी के रूप में विद्यमान है। यह सूर्य की भी आत्मा है। सूर्य में इससे प्रकाशित हो रहा है। हीरा की भी यही आत्मा है। इस सृष्टि में जो कुछ भी है वह सत् ब्रह्म ही है जो सबकी आत्मा है। अलग-अलग वस्तुओं में वह उस वस्तु की विशेषता के रूप में वही प्रकाशित हो रहा है। जैसे सूर्य में उष्णता उसी की है तथा चंद्रमा में शीतलता वही है। मिर्च में तीक्ष्णता भी वही है। तू गन्ना में मधुरता के रूप में वही परमात्मा अथवा आत्मा है। जल में रस वही है तो अग्नि में उष्णता भी वही है। वायु में शक्ति वही है पृथ्वी में गंध वही है।

उसी परमात्मा का प्रकाश हमारे अंदर मन के रूप में चंद्रमा है। बुद्धि के रूप में सूर्य है। अहंकार रूप से रुद्र है। अंतः करण में जब चेतना फुरती है तो यह फुरना ही चित्त कहलाती है। यह संकल्प विकल्प करने से मन कहलाने लगती है। इस प्रकार यह मन बुद्धि चित्त अहंकार ही चतुर्मुख ब्रह्मा है।

आत्म चैतन्य ही सर्वव्यापी ब्रह्मचैतन्य है। जब जागृत अवस्था में यही ज्ञानेंद्रियों के द्वारा सृष्टि का अनुभव करता है तथा अपने स्वरूप की विस्मृति के कारण यह कर्ता समझता है इसीलिए भोक्ता बनना पड़ता है। जब यह अपने को अकर्ता, भोक्ता साक्षी जानता है तब वह सारी सृष्टि का प्रकाशक होने के बाद भी अकर्ता ही रहता है। वही मैं स्वप्न में क्षीण वासनाओं के कारण चित्तवृत्ति के द्वारा तरह तरह के दृश्य बिना इंद्रियों के अनुभव करते हैं। इसी अनुभव का नाम स्वप्न है जिसे हम जागने पर मिथ्या कह देते हैं।

सुषुप्ति में हमारी इंद्रियां एवं अंतःकरण घना अवस्था (sound sleep) में होने के कारण अचेतन अवस्था में होते हैं तब हमारा नाम प्राग होता है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

वेदांत दर्शन भाग-12

सारी सृष्टि में परमात्मा ही व्याप्त है। जिस प्रकार से इस शरीर में आत्मा जो कि हम “मैं” के रूप में अनुभव करते हैं। यह मैं इस शरीर में राजा की तरह व्यापक है। जैसे राजा एक प्रशासनिक तंत्र के द्वारा अपने विशाल साम्राज्य पर नियंत्रण रखता है। इसी प्रकार हमारा मैं आत्मा सारे शरीर की अंदर बाहर की गतिविधियों का साक्षी रहता है और अकर्ता रहते हुए भी सबका नियामक होता है। यह साक्षी आत्मा, कूटस्थ, दृष्टा, अादि नामों से जाना जाता है। यह साक्षी ब्रह्म ही है। जो आकाश की तरह जैसे आकाश में ही सारी सृष्टि व्याप्त है उसी तरह से यह ब्रह्म चैतन्य हमारे अंदर सूक्ष्म रूप से व्याप्त है। यह ब्रह्म इस सारी सृष्टि का आधार है। यह ब्रह्म ही जागृत अवस्था में वैस्वानर अथवा विश्व के नाम से जाना जाता है। यही ब्रह्म चैतन्य स्वप्न अवस्था में तेजस कहलाता है। जिस प्रकार से हम अपनी प्रयोगशाला में नए-नए प्रयोग करते रहते हैं और उन प्रयोगों का आनंद भी लेते हैं। इसी प्रकार स्वप्न में हम अपनी चित्तवृत्ति के द्वारा इन प्रयोगों में व्यस्त रहते हैं। जिस समय हम स्वप्न अवस्था में जाते हैं उस समय हम अपनी जागृत अवस्था को अपने में लीन कर लेते हैं अथवा हम इसी बात को इस प्रकार भी कह सकते हैं कि हमारी यह स्वप्न अवस्था जागृत को अपने में लीन कर लेती है। इसीलिए हमें स्वप्न में जागृत की स्मृति नहीं रहती है तथा स्वप्न अवस्था में जो कुछ भी हम देखते हैं वह केवल चित् वृत्ति की प्रवृत्ति ही होती है। वहां कुछ भी ना होते हुए सारी रचना एक वृत्ति का ही विलास है। वहां यथार्थ में कुछ भी नहीं है लेकिन जैसे हम जागृत अवस्था में अपनी परिस्थिति से सुखी दुखी होते हैं ठीक वैसे ही स्वप्न में सुख दुख का अनुभव करते हैं। यदि हमारी तुरंत ही निद्रा टूट जाए तो हम फिर जागृत में आ जाते हैं। जागृत में आकर के कहते हैं कि सब मिथ्या था लेकिन यह भी तो नहीं कह सकते कि हमने नहीं देखा था क्योंकि जैसा हम जागृत में अपनी इंद्रियों से देखते हैं ठीक वैसा ही हमने वहां अनुभूति की है।

जिस प्रकार एक विद्यार्थी के लिए गणित के 1 प्रश्न में कुछ दिया हुआ रहता है और जो दिया है उसके आधार पर वह जो आगे का हल निकालता है इसी प्रकार से हमारे सामने जो कुछ हमने देखा वह मात्र अवस्था बदलने से मिथ्या हो गया। तब क्या जो कुछ हम इंद्रियों से देख रहे हैं वह भी तो मिथ्या नहीं। यह प्रश्न एक जिज्ञासु के सामने स्वतः खड़ा हो जाता है।

इसी प्रकार एक बार राजा जनक अपने महल में सो रहे थे और उन्होंने एक सपना देखा कि उनके ऊपर एक शत्रु राजा ने चढ़ाई कर दी और वह युद्ध में अपने शत्रु से पराजित होकर युद्ध क्षेत्र से भाग रहे हैं उनकी सारी सेना तितर-बितर हो गई है और उनको जान बचा कर भागते भागते पूरे 3 दिन हो गए। तीसरे दिन वह गंगा किनारे एक अन्न क्षेत्र की शरण में पहुंचे और वहां पर उनको खिचड़ी प्राप्त हुई तथा वह खिचड़ी उन्होंने एक झाड़ी के किनारे रखकर नदी में स्नान करने लगे। इतनी ही में दो सांड आपस में लड़ते हुए वहां आ पहुंचे और उनके द्वारा वह खिचड़ी फैल गई। उस से दुखी होकर उनको आंसू आ गए तथा ऐसी ही दुखद अवस्था में जब उनकी नींद टूटती है तब वह क्या देखते हैं की मैं तो यह अपने महल में बिस्तर पर लेटा हूं और यहां पर ना कहीं गंगा है ना ही सांड। यह तो केवल स्वप्न मात्र था जो मैं सोते में देख रहा था। अब वह एक सच्चे जिज्ञासु की तरह विचार करने लगे कि यह सत्य है या वह सत्य था? अब इस समस्या को हल करने के लिए उन्होंने बड़े-बड़े विद्वानों का सम्मेलन बुलाया लेकिन समस्या नहीं सुलझी। जब अष्टावक्र जी जो शरीर से आठ जगह से टेढे थे। इसीलिए उनका नाम अष्टावक्र था। जब वह जनक जी के सामने आए और उन्होंने कहा कि ना जाग्रत सत्य है ना ही स्वप्न सत्य है। सत्य तो केवल आत्मा ही है जो सूक्ष्म रूप से सर्वत्र है। उसी में सारी सृष्टि समुद्र में लहरों की तरह प्रतीति मात्र है। जैसे समुद्र में बड़ी सी बड़ी सुनामी आदि लहरें जल के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। सहारा समुद्र हमें छोटी और बड़ी लहरों अथवा शांत समुद्र के रूप में ही दृष्टिगोचर होता है चाहे वह शांत हो अथवा लहर के रूप में हो वह जल के अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं है। चाहे उस समुद्र का एक लोटा जल हो अथवा एक झील या सागर का एक हिस्सा हो है सब जल ही। इसी प्रकार से वह ब्रह्म ही आत्मा के रूप में किसी शरीर में हो अथवा बिना शरीर का हो सर्वत्र ब्रह्मा ही है। सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवाणु से लेकर हाथी घोड़े मनुष्य सूर्य चांद ब्रह्मा विष्णु महेश आदि देवता सभी रूपों में वही ब्रह्म व्यापक है। सीटी से लेकर ब्रह्मा विष्णु महेश तक सब उपाधियां ब्रह्म में ही कल्पित हैं। जैसे एक ही मनुष्य में पिता पुत्र पति अथवा बहन भाभी माता पत्नी तथा अध्यापक लिपिक मंत्री अफसर आदि उपाधियां कुछ भी हो लेकिन वह मनुष्य ही है। इसी प्रकार से सारी सृष्टि ब्रह्म (सच्चिदानंद) ही ईश्वर उपाधि से अपनी प्रकृति के द्वारा चला रहा है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

वेदांत दर्शन भाग-11

संसार के अधिकांश मत मजहबों का सोचने का ढंग अलग अलग है। वेदांत का सिद्धांत ऋषि-मुनियों ने अब उपनिषदों के नाम से कहा है। ये उपनिषद वेदों के सार हैं। इनकी संख्या किसी समय में बहुत थी लेकिन कालांतर में बहुत सारे उपनिषदों की खोज नहीं हो सकी। वर्तमान में 11800 उपनिषदों का जिक्र आता है। जिनमें 11 उपनिषद मुख्य हैं।

ब्रह्म तत्व पर विचार करने के लिए हम जहां हैं वहीं से हमें प्रारंभ करना होगा। अतः हमें अपने शरीर पर ही दृष्टिपात करना होगा। यह शरीर एक मंदिर की तरह है। इसमें 9 दरवाजे है। जिनके द्वारा हम अन्न, जल अग्नि वायु आकाश से एक हो रहे हैं। नाक के द्वारा हम सांस लेते हैं। श्वास बाहर के वातावरण से हमारे अंदर प्राणवायु के रूप में प्रविष्ट होता है और यही वायु शरीर में प्राण अपान आदि के रूप में विभाजित होकर सारे शरीर में प्राण रूप से व्याप्त है। इसी तरह से अग्नि, जल के संतुलन से ही शरीर चल रहा है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदि पंच तत्वों से निर्मित अन्न,जल,वायु आदि से यह सारा शरीर चल रहा है। इस प्रकार से विचार करने पर हम देखते हैं कि जिस आकाश में सारी सृष्टि व्यापक है। उस आकाश से भी हम हृदय आकाश के रूप में एक है। इस आकाश से भी सूक्ष्म जो तत्व है जो सारी सृष्टि का आधार है वह तत्व ही ब्रह्म तत्व है। जिसमें यह सारी सृष्टि व्याप्त है। ब्रह्म ही हमारे अंदर हमारा “मैं” है। उसे ही हम आत्मा कहते हैं। इसी ब्रह्म को बौद्धों ने शून्य कहा है। वेदांत के सिद्धांत से आत्मा के रूप में सब में एक ही तत्व जिस प्रकार से सब एक ही आधार आकाश में स्थित है। उसी प्रकार हम सब ब्रह्म में ही प्रकृति के संकल्प से प्रतीत हो रहे हैं। जैसे एक सुंदर महल किसी सुयोग्य इंजीनियर की कल्पना है। उसके द्वारा डिजाइन यह सारी की सारी सृष्टि की रचना है। जिस प्रकार एक मंदिर में सारा निर्माण सीमेंट, मिट्टी, लोहा, आदि का खेल है। इसी प्रकार से यह सारा का सारा खेल परमात्मा तत्व की सहचरी बुद्धि अथवा पत्नी की रचना है। यह सब इसी गृह मंत्रालय (पेटीकोट सरकार) का खेल है। करती सब कार्य ही श्रीमती जी संभाल रही हैं। यह कभी भी अपने पति से अलग नहीं होती। ब्रह्म अनंत व अनादि है। अनादि कहने का तात्पर्य यह है कि यह कब से है एवं कब तक रहेगा इसका कोई आदि अंत नहीं है। प्रकृति भी अनादि है। इसी का नाम माया, अविद्या, आदि कहा है। ब्रह्म का ज्ञान होने पर अज्ञान के ना रहने से अविद्या का आवरण हट जाता है। इसीलिए अविद्या को स:अंत कहा है।

हम अपने जीवन में अपने को तीन स्थितियों में पाते हैं। पहली अवस्था हमारी जागृत है। इस अवस्था में हम संसार में सारा व्यवहार इंद्रियों से करते हैं। यह इंद्रियां ही कर्ण कहलाती हैं। यह कर्ण दो तरह के हैं। अंदर, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार। यह चारों अंतः करण के नाम से जाने जाते हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश इसके मूल तत्व यानी क्रमश: आकाश का मूल शब्द तन मात्रा, वायु का स्पर्श तन मात्रा, इसी प्रकार अग्नि की शब्द, जल का रस एवं पृथ्वी की गंध तन मात्रा है। यह पांचों तन मात्राएं एवं मन बुद्धि अहंकार इन आठों को सूक्ष्म शरीर अथवा पुर्याष्टका का कहलाती है।

जागृत अवस्था में सारा व्यवहार मन बुद्धि चित्त अहंकार एवं पांच ज्ञानेंद्रियां अर्थात कान नाक आंख जिव्या त्वचा एवं पांच कर्मेंद्रियों हाथ पांव वाणी गुदा शिष्न एवं पांच प्राण यही कह रहे हैं और हम इस स्थूल जगत को इन इंद्रियों एवं अंतः करणों से व्यवहार कर रहे हैं। इस जागृत अवस्था में हमारी उपाधि वेश्वानर है। यही सब लोग हम स्वप्न में चित्तवृत्ति के द्वारा किया करते हैं। इस अवस्था का नाम स्वप्न कहलाता है। और सारा का सारा भोग प्रवृत्ति रूप से स्वप्न अवस्था में होता है।

इसमें हमारी उपाधि तेजस्व होती है जब हम ना तो इंद्रियों से व्यवहार करते हैं और ना स्वप्न ही देखते हैं। हम जागृत और स्वप्न दोनों के अभाव का नाम सुषुप्ति है। जिस समय में हम गहन सुषुप्ति होते हैं उस समय हमारी उपाधि प्राग होती है। इन तीनों अवस्थाओं से निर्लिप्त वास्तव में हम निर्विकार तत्व हैं।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

वेदान्त दर्शन भाग-10

वेदांत के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से समझने के लिए अथर्ववेद के मांडूक्य उपनिषद पर हम लोगों को विचार करना होगा। मांडूक्य उपनिषद के आधार पर ही पूर्व आचार्य प्रवर श्री गौड़पदाचार्य जिनके लिए कहा जाता है कि वह सुखदेव जी के शिष्य थे और वह गुरु की तलाश में दक्षिण भारत से पैदल चलकर सुखदेव जी के पास पहुंचे थे। सुखदेव जी उन दिनों उत्तर भारत में रहते थे। इसी कारण से इनका नाम गौड़पदाचार्य हुआ। इन्हीं की शिष्य परंपरा के आचार्य प्रवर श्री शंकराचार्य भगवान ने इनके द्वारा मांडूक्य उपनिषद पर लिखी हुई 215 कार्यकाअों के आधार को लेकर अद्वैत संप्रदाय की स्थापना की। संप्रदाय का अर्थ होता है कि किसी एक विशेष सिद्धांत की शिक्षा।

मांडूक्य उपनिषद के अनुसार ॐ जिसे शास्त्रों की भाषा जिसे शास्त्रों की भाषा में प्रणव कहा जाता है।यह ‘अ’,’उ’ अौर ‘म्’ इन तीन अक्षरों से बनता है। इन तीन अक्षरों की अपेक्षा से म् की अर्धमात्रा ही वह तुरिय तत्व है। इसे अमात्र भी कहते हैं। यह तुरिय तत्व ही ब्रह्म कहलाता है। जो सारी सृष्टि का आधार है। सारी सृष्टि इसी तत्व में कल्पित है। जैसे आकाश में तरवरे भांसते हैं। अथवा मिट्टी में ही पर्वत, वन, नदी, पशु, पक्षी, मनुष्य, आदि सृष्टि प्रतीत हो रही है। मिट्टी में ही मकान, बर्तन, हीरा, मोती, पत्थर सब प्रतीत हो रहे है। इसी प्रकार सारी सृष्टि एक ही परमात्मा तत्व में प्रकृति द्वारा कल्पित है। यह प्रकृति और कुछ नहीं प्रकृति यानी स्वभाव। यह स्वभाव किसका? उस तुरिय तत्व का ही है जिसे हम ब्रह्म कहते हैं। यह ब्रह्म ही समस्त जीवधारियों में आत्मा के रूप में विद्यमान रहता है। सबकी आत्मा यही तत्व है। इसीलिए यह परमात्मा कहलाता है। इसी परमात्मा तत्व को हृदय में विराजमान वैष्णव नारायण कहते हैं। यह छोटा सा बामन भगवान ही हृदय कमल पर विराजमान नारायण है। शौव्यौं का शिव है। वेदांतीओं का कठस्त आत्मा है। अलग-अलग संप्रदायों में इसके अलग-अलग नाम हैं। इसी परमात्मा को मुसलमान खुदा या अल्लाह कहते हैं। ईसाई जीसस आदि नाम से कहते हैं।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

वेदान्त दर्शन भाग-9

संसार के अधिकांश लोग परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकारते हैं। इसमें समस्त आस्तिक मतों को यह स्वीकार की है कि इस संसार का बनाने वाला एक ही परमात्मा है। उसका नाम अलग-अलग है और वही इस सृष्टि में समस्त जीवो को उनके कर्मों के अनुसार ही फल देता है। इस संसार में हम जैसे कर्म करेंगे वैसा ही शुभ अशुभ फल के रूप में हमें सुख और दुख भोगना ही पड़ेगा। उससे हम बच नहीं सकते। किन्तु वेदांत के अतिरिक्त सभी अवैदिक मतों का यह मत है कि ईश्वर अलग है और वह जीवो को कर्मों के अनुसार फल देता है। लेकिन वेदांत कहता है कि एक ही तत्व जो अनादि है। अनादि का अर्थ हुआ कि वह किसी से पैदा नहीं हुआ और कभी पैदा नहीं हुआ। उसकाे पैदा करने वाला कोई मां बाप नहीं है। वह अनादि तत्व ही अकाल पुरुष कहलाता है। जिसका तात्पर्य है कि वह कभी मरने वाला भी नहीं है। न वह किसी से पैदा हुआ है और न वह मरने वाला है। इसीलिए वेदांती लोग डंके की चोट पर कहते हैं कि “न माता पिता बंधु कोई है मेरा सभी भूत प्राणी का कारण शिवोहम।”

वह अकाल पुरुष अनादि ही नहीं अनंत एवं अक्षर भी है। अनंत का तात्पर्य हुआ कि वह हर जगह है। इससे हम कह सकते हैं कि वह देश परछिन्न नहीं है। यानी वह ऐसा नहीं है कि भारत में है और अमेरिका में नहीं अथवा अफ्रीका में नहीं, पृथ्वी पर है आकाश में नहीं या भूमि पर नहीं जल में नहीं। वह वस्तु परछिन्न भी नहीं है जिसका तात्पर्य होता है कि जो संसार की प्रत्येक वस्तु चाहे वो मनुष्य, पशु-पक्षी, आदि के शरीर हो, नदी, पहाड़, पेड़, पत्थर, आदि हो सभी में वह परमात्मा व्यापक है अथवा जो कुछ भी इस सृष्टि में प्रतीत हो रहा है वह सब परमात्मा में ही है और सब में परमात्मा है। पिछले अवतरणों में यह बात स्पष्ट कर दी गयी है कि वेदांत की व्यापकता ऐसी नहीं है कि लोहे के गोले को अग्नि में डालने पर लोहे में अग्नि व्यापक होकर वह जलाने लगती है। लेकिन वेदांत की व्यापकता ऐसी है कि जैसे औज़ार क्यों न हो चाहे वह चमीटा हो या कढ़ाई हो अथवा हथोड़ी हो चाहें लोहा काटने वाली छैनी हो लोहा सब में व्यापक है। हथियारों में भेद है लोहे में कोई भेद नहीं लोहा सबमे एक है। इस प्रकार से सारी सृष्टि एक अक्षर तत्व में व्यापक है। वह अक्षर तत्व ही अकाल पुरुष है। पुरुष कहने का तात्पर्य यह है कि यह शरीर रुपी नगर में आत्मा के रूप में प्रत्येक जीव में विद्यमान है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

वेदान्त दर्शन भाग-8

यह संसार शास्त्रों की भाषा में ‘भवाटवी’ कहलाता है। भव माने है संसार और अटवी माने है जंगल। जब मनुष्य जंगल में कुछ पाने के लिए प्रवेश करता है और अपनी आवश्यक वस्तु को खोजने के चक्कर में वह यह भी भूल जाता है कि मैं कहाँ से आया था और किधर से मुझे निकलना है तब वह उस जंगल में अनेकों-अनेक कष्ट भोगता है और जब तक उसे मार्ग बताने वाला कोई दूसरा पुरुष नहीं मिल जाता तब तक वह भटकता ही रहता है। जब उसे कोई जानकार व्यक्ति मिलता है तब वह उसे मार्ग बताकर उस अटवी से उन महापुरुष के बताये हुए मार्ग का श्रद्धापूर्वक अनुशरण करके निकल पाता है। यह संसार ऐसा ही एक जंगल है जिसमे हम भटक रहे हैं। जब तक इस संसार रुपी जाल से निकलने का मार्ग बताने वाला हमे कोई सतगुरु नहीं मिलता तब तक हम अपने सही मैं को पहचान नहीं पाते। वह मैं ही हमारा अपना घर है। जैसे हम कहीं भी घूमें हमे शांति अपने घर में ही मिलती है। उसी प्रकार जब तक हम अपने असली स्वरुप को पहचानकर इसे स्वप्न की तरह केवल प्रतीत होने वाले संसार को अनुभव से मिथ्या समझकर इसके माया जाल से निकलकर अंदर से इससे असंघ होकर और संसार का व्यवहार करते रहे जैसे कोई हाई कोर्ट जज अथवा किसी प्रांत का मुख्य मंत्री अपने बंगले में परिवार के साथ रहकर बगीचे में भी घूमता है। अपने बच्चों, नाती-पोतों को भी प्यार करता है और कार्यालय में भी बैठकर देश की सेवा करता है। इसी प्रकार से हम संसार के समस्त कर्तव्यों को करते हुए भी संसार से विरक्त रहकर आनंदमय स्थित रह सकते हैं। चाहे हम नौकरी करें या व्यापार करें उसमे कुछ भी फर्क नहीं पड़ेगा।

यही युक्ति कृष्ण ने परिवार के मोह में फसे हुए अर्जुन को गीता के माध्यम से जब समझायी और अनेकों-अनेक युक्तियों के द्वारा भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन की बुद्धि में यह बात पक्की कर दी कि संसार में एक परमात्म तत्व ही सत्य रूप से है और वह हमसे कहीं बाहर नहीं है। वह हमारे अंदर ही आत्मा के रूप में विराजमान है। वह हमारे प्रत्येक क्रियाकलाप का साक्षी भी है।

जागृत अवस्था में हमारी मन सहित 11 इन्द्रियां एवं बुद्धि उसी की सेवा के लिए है। जब हमारी बुद्धि संसार की सेवा के लिए झुकी हुई मन सहित इन्द्रियों के साथ मिल जाती हैं तब वह व्यभिचारिणी कहलाती है। यह व्यभिचारिणी बुद्धि ही भवाटवी में भटकाती है। जब हमें कोई सतगुरु रुपी महापुरुष मिलते हैं तब वह हमारी बुद्धि का मार्गदर्शन करके हमे अपने घर अर्थात परमात्म तत्व का उपदेस करके जीव और ब्रह्म की एकता का बोध कराकर हमें अपने स्वरुप में स्थित करा देते हैं और हम अपने साक्षी स्वरुप में स्थित होकर अपने को ज्ञानस्वरूप जानकार आनंदमय स्थित कर लेते हैं। तब हम अपने निजस्वरूप को पहचानकर सारे द्वंदों से जैसे राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह, आदि से मुक्त हो जाते हैं। यही स्वरुप आनंद स्थिति है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज