ब्रह्म जोकि अनादि,अनंत है एवं यह तुरीय तत्व है अर्थात यह किसी से पैदा नहीं हुआ यानी यह अनादि है। जो चीज अनादि होती है वह अनंत भी होती है इसलिए यह अकाल कहलाता है। इस सृष्टि की प्रत्येक वस्तु उसी में सोने में जेवर की तरह प्रतीत हो रही है। जैसे जेवर में सोना ही सोना होता है। जीवन एक आकृति मात्र देखने में ही आता है। इसी तरह से सारी सृष्टि में ब्रह्म ही है दूसरे शब्दों में यह सृष्टि ब्रह्म का शरीर है। जहां पर हम किसी वस्तु का अपनी इंद्रियों से अनुभव करते हैं उन वस्तुओं में भी वह ब्रह्म है और जहां आकाश है वहां भी वही है इसीलिए उसका नाम आकाशवत् आकाश से भी सूक्ष्म जिसमें निराकार भी एक आकार ही है। वह एक सर्वव्यापी अनादि अनंत तत्व है जिस तत्व तक ना पहुंचने के कारण महात्मा गौतम बुद्ध ने शून्य माना। ईश्वर वादी दार्शनिकों ने ईश्वर कहा। शंख वादियों एवं वेदों ने उसे ब्रह्म कहा है वही सत्य है। वह समस्त शरीरों में आकाशवत् रहने के कारण आत्मा कहलाता है। जैसे हमारा शरीर सृष्टि में वायु अग्नि आदि तत्वों से एक हो रहा है उसी प्रकार हम उस तुरीय तत्व से एक हो रहे हैं। जैसे समुद्र की कोई भी छोटी बड़ी लहर समुद्र के शरीर जल्द से अलग नहीं है इसी प्रकार से हम ब्रह्म से अलग नहीं है। यह ब्रह्म आत्मा के रूप में सब शरीरों में व्यापक है। यह जड़ नहीं है। चैतन्य एवं स्वयं प्रकाश तत्व है। इसके प्रकाश से प्रकाशित होने वाला अंतः करण यानी मन,बुद्धि,अहंकार है। इसी का प्रकाश हमारी ज्ञानेंद्रियों एवं कर्म इंद्रियों पर है। हमारे शरीर की सारी रचना इसी आभाषिक चैतन्य का कारी है। जिसका यह कारी है वह परमात्मा का स्वभाव होने से प्रकृति कहलाती है। जैसे हमारी छाया जो कि प्रकाश से बनती है हमसे अलग नहीं है। हमारे बगैर छाया हो भी नहीं सकती। उस छाया में हम ही सत्य हैं। हम से उसका कोई प्रयोजन नहीं है तथा हम उसके कर्ता भोक्ता भी नहीं है फिर भी वह हमारा ही स्वरूप है। इस प्रकार से हम अकर्ता, अभोक्ता होते हुए भी सब में व्यापक बने हुए हैं। चेतना केवल शरीरों में ही प्रकट होती है। इसी चेतना का नाम आत्मा है। ब्रह्म अनादि अनंत होने के कारण प्रकृति भी अनादि, अनंत व अव्यय है।
हमारे शरीर में जब हम सुषुप्ति में होते हैं तब इस ब्रह्म से एक होते हैं। जैसे ही निद्रा टूटती है उस समय हम अव्यक्त से व्यक्त होते हैं तब हमारा नाम मह तत्व हो जाता है। यह महतत्व सर्वव्यापी है। हमारे शरीर में इसे बुद्धि कहते हैं। सारे संकल्प इसी में होते हैं संकल्पों के कारण मन कहलाती है। मैं पना करने के कारण यह अहंकार कहलाती है। चेतना फुरने का नाम चित् है। इस प्रकार से यह पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश एवं मन बुद्धि अहंकार के रूप में हमारी अष्टधा प्रकृति की रचना यह सृष्टि है। यह रचना प्रकृति में उपस्थित 3 गुण सतोगुण रजोगुण तथा तमोगुण का कारी है। इसीलिए इसका नाम अष्टधा प्रकृति है। इसीलिए अध्यात्म रामायण में जब राम ने सीता की ओर इशारा किया कि हनुमानजी अपने निस्वार्थ सेवक हैं यह ज्ञान के अधिकारी हैं। इनको ज्ञान दो तब सीता ने कहा कि सारी सृष्टि मैं करती हूं आरोप राम में किया जाता है। स्मरण रहे कि राम कौन है राम सर्वव्यापी सब में रमने वाले चैतन्य है। सीता प्रकृति जगत जननी है।
स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज