वेदांत दर्शन-15

ब्रह्म जोकि अनादि,अनंत है एवं यह तुरीय तत्व है अर्थात यह किसी से पैदा नहीं हुआ यानी यह अनादि है। जो चीज अनादि होती है वह अनंत भी होती है इसलिए यह अकाल कहलाता है। इस सृष्टि की प्रत्येक वस्तु उसी में सोने में जेवर की तरह प्रतीत हो रही है। जैसे जेवर में सोना ही सोना होता है। जीवन एक आकृति मात्र देखने में ही आता है। इसी तरह से सारी सृष्टि में ब्रह्म ही है दूसरे शब्दों में यह सृष्टि ब्रह्म का शरीर है। जहां पर हम किसी वस्तु का अपनी इंद्रियों से अनुभव करते हैं उन वस्तुओं में भी वह ब्रह्म है और जहां आकाश है वहां भी वही है इसीलिए उसका नाम आकाशवत् आकाश से भी सूक्ष्म जिसमें निराकार भी एक आकार ही है। वह एक सर्वव्यापी अनादि अनंत तत्व है जिस तत्व तक ना पहुंचने के कारण महात्मा गौतम बुद्ध ने शून्य माना। ईश्वर वादी दार्शनिकों ने ईश्वर कहा। शंख वादियों एवं वेदों ने उसे ब्रह्म कहा है वही सत्य है। वह समस्त शरीरों में आकाशवत् रहने के कारण आत्मा कहलाता है। जैसे हमारा शरीर सृष्टि में वायु अग्नि आदि तत्वों से एक हो रहा है उसी प्रकार हम उस तुरीय तत्व से एक हो रहे हैं। जैसे समुद्र की कोई भी छोटी बड़ी लहर समुद्र के शरीर जल्द से अलग नहीं है इसी प्रकार से हम ब्रह्म से अलग नहीं है। यह ब्रह्म आत्मा के रूप में सब शरीरों में व्यापक है। यह जड़ नहीं है। चैतन्य एवं स्वयं प्रकाश तत्व है। इसके प्रकाश से प्रकाशित होने वाला अंतः करण यानी मन,बुद्धि,अहंकार है। इसी का प्रकाश हमारी ज्ञानेंद्रियों एवं कर्म इंद्रियों पर है। हमारे शरीर की सारी रचना इसी आभाषिक चैतन्य का कारी है। जिसका यह कारी है वह परमात्मा का स्वभाव होने से प्रकृति कहलाती है। जैसे हमारी छाया जो कि प्रकाश से बनती है हमसे अलग नहीं है। हमारे बगैर छाया हो भी नहीं सकती। उस छाया में हम ही सत्य हैं। हम से उसका कोई प्रयोजन नहीं है तथा हम उसके कर्ता भोक्ता भी नहीं है फिर भी वह हमारा ही स्वरूप है। इस प्रकार से हम अकर्ता, अभोक्ता होते हुए भी सब में व्यापक बने हुए हैं। चेतना केवल शरीरों में ही प्रकट होती है। इसी चेतना का नाम आत्मा है। ब्रह्म अनादि अनंत होने के कारण प्रकृति भी अनादि, अनंत व अव्यय है।

हमारे शरीर में जब हम सुषुप्ति में होते हैं तब इस ब्रह्म से एक होते हैं। जैसे ही निद्रा टूटती है उस समय हम अव्यक्त से व्यक्त होते हैं तब हमारा नाम मह तत्व हो जाता है। यह महतत्व सर्वव्यापी है। हमारे शरीर में इसे बुद्धि कहते हैं। सारे संकल्प इसी में होते हैं संकल्पों के कारण मन कहलाती है। मैं पना करने के कारण यह अहंकार कहलाती है। चेतना फुरने का नाम चित् है। इस प्रकार से यह पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश एवं मन बुद्धि अहंकार के रूप में हमारी अष्टधा प्रकृति की रचना यह सृष्टि है। यह रचना प्रकृति में उपस्थित 3 गुण सतोगुण रजोगुण तथा तमोगुण का कारी है। इसीलिए इसका नाम अष्टधा प्रकृति है। इसीलिए अध्यात्म रामायण में जब राम ने सीता की ओर इशारा किया कि हनुमानजी अपने निस्वार्थ सेवक हैं यह ज्ञान के अधिकारी हैं। इनको ज्ञान दो तब सीता ने कहा कि सारी सृष्टि मैं करती हूं आरोप राम में किया जाता है। स्मरण रहे कि राम कौन है राम सर्वव्यापी सब में रमने वाले चैतन्य है। सीता प्रकृति जगत जननी है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

वेदांत दर्शन भाग-14

परमात्मा सत्य है। यानी इस सृष्टि में केवल वही है। यह सारा विश्व उसका ही चमत्कार यानी उसी की महिमा का प्रकाश है। वह चेतन है। यानी वह सर्वज्ञ है। सब उसी से चल रहा है। कैसे यह संसार वह संचालित करता है और इस संसार में जिसकी सत्ता के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता है उस की प्रशासनिक व्यवस्था के विचार का नाम ही दर्शन है। उसकी वैज्ञानिक विचार का ही नाम दर्शनशास्त्र है। जिसके अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग नाम है इंग्लिश भाषा में उसको फिलॉस्फी कहते हैं। भारतीय दर्शन की जड़ें 1955885120 वर्ष पुरानी है। भारतीय मनुषी(जो मन का ईष (मालिक) है, जो मन की अधीन ना हो करके मन से सेवक की तरह अपनी सेवा तो लेता है लेकिन वह कभी उसके अधीन नहीं होता अर्थात जो अपनी बुद्धि के द्वारा मन को घोड़े की लगाम की तरह अपने हाथ में रखता है।) ने दर्शनशास्त्र का विचार आरण्य अर्थात वनों (जहां पर किसी प्रकार का रण अर्थात द्वंद यानी संसार के झंझट ना हो) मे किया। इसीलिए इन उपनिषदों को आरण्यक भी कहा जाता है। गीता जो महाभारत जैसे बहुत बड़े महायुद्ध में मोह के वश हुए अर्जुन जैसे योद्धा को श्री कृष्ण जैसे जोकि साक्षात परमात्मा के अवतार थे गुरु ने सुनाई और उसको अंत में कहना पड़ा की मेरा मोह नष्ट हो गया है (नष्टोमोह) और मुझे अपने स्वरूप का ज्ञान हो गया है। अब मैं आपके वचनों का पालन करूंगा। यह अपवाद के रूप में है गीता को कुछ विद्वान स्मृति ग्रंथ कहते हैं एवं कुछ लोग इसे अंतिम उपनिषद भी कहते हैं। अधिकांशतः गीता की मान्यता एक स्मृति ग्रंथ के रूप में ही है और यह प्रस्थानत्रे का मुख्य ग्रंथ है। प्रस्थानत्रे मैं ब्रह्म सूत्र उपनिषद और गीता प्रधान है।

भारतीय दर्शन के अनुसार परमात्मा जिसे हम सच्चिदानंद कहते हैं वह सृष्टि के समस्त जीवो में आत्मा के रूप में आकाशवत् व्यापक है। यह व्यापकता जैसा कि पहले कहा जा चुका है जेवर में सोने की तरह होती है। परमात्मा का प्रकाश प्रकृति के कार्य अंतः करण में पड़ता है यह अंतःकरण ही पिछले दृष्टांत में बताया गया मिरर है। इस अंतः करण से ही प्रतिबिंबित होकर यह बुद्धि के रूप में प्रतिभाषित होकर के सारा व्यवहार करता है। इस व्यवहार को अज्ञानी जीव मनुष्य अपनी बुद्धि का चमत्कार मानता है और समझदार मनुष्य इसे परमात्मा की कृपा मानता है जो परमात्मा की कृपा मानता है वह भक्त है। जो अपनी आत्मा को परमात्मा स्वरुप अनुभव करता है, वह ज्ञानी है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज