वेदान्त दर्शन भाग-6

मनुष्य शरीर में अन्य शरीरों से कुछ विलक्षणतायें हैं जैसे राग, द्वेष, मोह, ममता, आदि। इनमे से संतान के प्रति ममता-मोह पशु पक्षियों, आदि योनियों में भी रहता है लेकिन यह थोड़े समय के लिए ही होता है, जब तक संतान अपना पेट भरने में सक्षम न हो जाए किन्तु मनुष्य योनि में ममता, मोह, राग, द्वेष, वितृष्णा, लोकेष्ण, पुत्रेष्णा, आदि दोष हैं जो जीवन पर्यन्त रहते हैं। इन पर नियंत्रण करने के लिए मनुष्य को परमात्मा ने पर्याप्त बुद्धि प्रदान की है। हमारे ऋषि मुनियों ने आत्म चिंतन करके इस समस्या के हल के लिए हमारे समाज को वेदों के रूप में तथा धर्मशास्त्र एवं स्मृति ग्रंथों के रूप में अपना चिंतन रखा। जिससे की मनुष्य का जीवन एक अनुशासित समाज के रूप में रहे। किसी भी देश अथवा समाज के लिए उपयोगी, शिक्षित व विचारशील व्यक्ति ही होता है। विचार करके देखें तो दशरथ पुत्र राम, भरत, शत्रुघ्न, आदि का इतना उच्च जीवन बनाने में यही ऋषि मुनियों का साहित्य है। जिसे हम मनुस्मृति, गीता एवं उपनिषदों के रूप में पाते हैं।

यह स्मृतिग्रन्थ चाहे मनुस्मृति हो अथवा गीता। हम विचार करके देखें कि समस्त शास्त्रों में एक ही सिद्धांत को तरह-तरह से प्रतिपादित किया गया है। वह सिद्धांत यह है कि एक ही सत तत्व समस्त सृष्टि में और वह तत्व चैतन्य है। इसी वजह से वह सर्वज्ञ है तथा सर्वज्ञ होने से सर्वेश्वर भी वही है तथा समस्त शरीरों में आकाशवत आत्मा के रूप में विद्यमान है और प्रत्येक शरीर में अलग-अलग मालुम होते हुए भी वह आत्मा के रूप में सर्वेश्वर है। समस्त योनि का कारण ईश्वर है। यही परमात्मा का अंश है। यह एक शरीर का ही दृष्टा न होकर के साड़ी सृष्टि का दृष्टा परमात्मा है, जिसको हम मैं कहते हैं। वह एक ही शरीर का मैं नहीं है वह समस्त शरीरों में मैं के ही नाम से जाना जाता है। उसी मैं को हम सामने वाले से आप या तुम कहते हैं और जो हमसे अदृष्ट है उसे वह कहते हैं। लेकिन यह समस्त नाम एक ही तत्व के हैं जो और सबमे वह आत्मा के रूप में विद्यमान है। इस प्रकार से यह शरीर अगणित कीटाणुओं का समूह मात्र है। इसी प्रकार यह विश्व विराट रूप में जीवों का समूह एक ही शरीर है। यही सोच ऋषि-मुनियों ने शास्त्रों में अपने विचार के रूप में रखी है। इन शास्त्रों के विचारों को जो व्यक्ति गुरु एवं शास्त्रों पर श्रद्धा रखते हुए श्रवण तथा मनन एवं चिंतन करेगा उसके जीवन में यह उतरेगा। मनुष्य के जीवन में जो नैसर्गिक दोष जैसे राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद-मत्सर, आदि विद्यमान रहते हैं उन पर विजय पा सकता है।

उपरोक्त समस्त दोष स्वाभाविक रहते हुए भी विचारवान जागृत पुरुष को यह हानि नहीं पंहुचा सकते बल्कि उनके यह अस्त्र-शास्त्र बनकर रहते हैं। ऐसे विचारवान पुरुषों में ही दशरथ पुत्र राम को एक आदर्श पुरुष के रूप में बाल्मीकि जी ने प्रस्तुत किया। वह अपनी धर्मनिष्ठा के कारण ही मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये तथा उनके छोटे भाई भरत एवं माता कौशल्या तथा सुमित्रा, सीता, आदि ने अपना-अपना आदर्श रखा और ये युग-युगांतर से आज भी हमारे सबके लिए आदर्श बने हुए हैं और बने रहेंगे।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

वेदान्त दर्शन भाग-5

परमात्म तत्व अद्वितीय है अर्थात वह सब रूपों में जैसे समुद्र की समस्त छोटी बड़ी लहरों आदि के रूप में जल ही है। जल कहो अथवा समुद्र कहो सभी रूपों में एक ही जल लहर, बुलबुला आदि के रूप में प्रतीत हो रहा है। प्रत्येक लहर अलग-अलग है और वह अपना अलग अस्तित्व रखती है व बनती मिटती है तथा शान्त हो जाती है किन्तु पानी से कोई भी लहर भिन्न नहीं है, जैसे महासागर में पानी से भिन्न कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार इस संसार रुपी भवसागर का जल यह तत्व ही है, जो सृष्टि के रूप में प्रतीत हो रहा है, जिसमे अनेका-अनेक ब्रह्माण्ड रुपी भवसागर हैं। जिनकी गणना असम्भव है।

इस सृष्टि में परमात्मा ने मनुष्य को बुद्धि इतनी दी है कि वह आत्म चिंतन करके सब कुछ परमात्मा के रूप में जानकर संसार का सब व्यवहार करते हुए व संसार से विरक्त रहते हुए व अपने समस्त कर्तव्यों का पालन करते हुए आनंदमय स्थित रह सकता है और उसका कोई भी द्वन्द यानी सुख-दुःख, मान-अपमान, मिलना-बिछुड़ना यह सब द्वन्द सहज ही लगेंगे। जैसे लहर ये जान जाए कि हम पानी हैं और वायु अथवा पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण हम में लहरें बन रही हैं व बिगड़ रही हैं लेकिन हम तो जल हैं तथा हमारे जल होने में कोई अंतर नहीं पड़ रहा चाहें हम ऊँचे उठे अथवा नीचे गिरें, लहर बनें अथवा शांत रहें, हमारा जल का स्वरुप बनने व बिगड़ने वाला नहीं है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण भारतीय इतिहास में रामायण के प्रमुख पात्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न एवं माता कौशल्या, सुमित्रा, आदि ने प्रस्तुत किया। यदि हम इन पात्रों की परिस्तिथि पर चिंतन करें तो हम देखते हैं कि राम एक सम्राट के पुत्र हैं और जनता में उनकी लोकप्रियता चरम सीमा पर है तथा पिता को अत्यंत लाड़ले भी हैं और सब तरह से सुयोग्य हैं। पिता ने अपनी छोटी पत्नी से वचनवद्ध होने के कारण इनको ऐसे समय वनवास की घोषणा की जब वह प्रातःकाल राम को युवराज के पद पर आसीन करने जा रहे थे। लेकिन राम को ऐसी विपरीत घोषणा से कि मुझे 14 साल का वनवास और मेरे छोटे भाई को युवराज का पद दिया जा रहा है, कुछ भी फर्क नहीं पड़ा और उन्होंने उस आज्ञा का पालन ऐसे ही किया जैसे युवराज की गद्दी को स्वीकार किया था।

इधर जब राम के वन गमन के बाद दशरथ ने राम का वियोग न सहने के कारण प्राणो का परित्याग कर दिया तथा भरत को जब ननिहाल से बुलाकर राजगद्दी देने का यह कहकर राज्याभिषेक करने का प्रस्ताव किया कि आपको राजा ने उत्तराधिकारी बनाया है तथा राम लक्ष्मण यहाँ है नहीं। इसलिए आपका कर्त्तव्य हो जाता है कि आप राज्य को संभालें। भरत के मना करने पर गुरु वशिष्ठ जी ने भी कहा कि आपकी इच्छा राज्य करने की नहीं है तो आप राम के लौटने पर उन्हें गद्दी सौंप दें लेकिन उस समय तक आप पिता की आज्ञा समझकर गद्दी को स्वीकार कर लें। लेकिन भरत ने अपने स्वम के विवेक को प्रधानता देते हुए राम को अयोध्या लौटा कर उन्ही को गद्दी देने का प्रस्ताव रखा और सम्राट के पद से विरक्त रहे।

जब चित्रकूट से राम ने वापस आना स्वीकार नहीं किया तब भरत ने राम की ही खड़ाउओं को राज सम्राट की गद्दी पर विराजमान करके स्वम विरक्त रहकर साधू जीवन जीते हुए अयोध्या के राज्य को संभाला ही नहीं बल्कि पहले से राज्य का प्रत्येक भाग जैसे सेना और कोष आदि इन सबको किसी को दोगुना व ढाईगुना बढ़ाकर के राम को 14 साल बाद हस्तांतरित किया। इससे यह प्रमाणित हो गया कि योग्यता भरत में राम से काम नहीं थी लेकिन वह वंश परंपरा को कायम रखकर राम को ही उन्होंने गद्दी पर बैठाला तथा स्वम जनता के सेवक बनकर सेवा की।

राम जब लंका विजय करके सम्राट के पद पर आसीन हुए तब उन्होंने 8 राज्यों की स्थापना की और स्वम को सेवक बनाकर के रखा तथा प्रजा का पुत्रवत पालन किया तथा प्रत्येक भाई के 2-2 पुत्र भी हुए। इस प्रकार संसार के समस्त कार्य करते हुए भी उनको शास्त्रों ने मर्यादा पुरुषोत्तम की उपाधि से विभूषित किया तथा वाल्मीकि जी ने राम को साक्षात धर्म का विग्रह माना। कहने का तात्पर्य कि संसार में रहते हुए संसार को मिथ्या समझकर अपने कर्तव्यों का पालन करो। ईशादि उपनिषद का पहला ही मन्त्र है – “ईशावास्य इदं सर्वं” उसका त्याग पूर्वक पालन करो। धन के लिए गिद्ध मत बनो।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

वेदान्त दर्शन भाग-4

इस सृष्टि के मूल में केवल एक ही तत्व है। तत्व शब्द दो शब्दों से मिलकर बनता है। पहला “तत” इसका अर्थ होता है “वह” यानी मैं के अतिरिक्त जो कुछ भी जानने में आ रहा है वह सब। इसी को गीता में इदम कहा है। इदम यानी यह सब जो कुछ जानने में आ रहा है। इसी प्रकार से यह और वह सर्वनामों के रूप में जो कुछ भी जानने में आ रहा है वह सब “तत” है और प्रत्येक प्राणी के अंदर जो आत्मा के रूप में अथवा मैं के रूप में जाना जा रहा है वह “त्वम्” है। इस प्रकार से “तत” और “त्वम्” की संधि करने पर व्याकरण के अनुसार “तत्व” शब्द निर्मित होता है। सारी सृष्टि में यह-वह व मैं जो भी जानने में आ रहा है वह एक ही अद्वैत तत्व है। दूसरा कुछ भी नहीं है। वह तत्व ही सत्य है और वही चैतन्य यानी जाननेवाला है।

यह जानने का गुण अंतःकरण के ही माध्यम से होता है। अंतःकरण चतुर्मुखी है, इसमें प्रमुख मन है। मन का काम संकल्प करना है। इसलिए यह चंचल भी है। मन का ही दूसरा रूप बुद्धि है, जिसका निश्चय करना है। बिना बुद्धि के निश्चय किये शरीर की कोई इंद्री काम नहीं करती। इसीलिए मन पर नियंत्रण बुद्धि रहता है। तीसरा करण अहंकार है, जिसमे करता भाव प्रमुख होता है। मनुष्य जीवन में इसकी प्रधानता होती है। मनुष्य जब अपने को करता मानकर किसी कार्य को करता है तो वह उसका भोगता हो जाता है। चौथी इंद्री चित्त मानी जाती है, जिससे जीव में कुछ करने की प्रेरणा होती है। किसी भी दृष्य अथवा शब्द की ओर आकर्षण चित्त का ही होता है। इस प्रकार से चेतना के शरीर में अंतःकरण के रूप में यह चारों (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) रूप ही अंतःकरण कहलाते हैं। वास्तव में मन का ही रूप बुद्धि, अहंकार, आदि हैं। इसलिए भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा है कि “इन्द्रीओं, मैं मन में हूँ”

परमात्मा अपने को प्रगट(जनाना) करना चाहता था, लेकिन कोई दूसरा हो तो उसको जनाए। इसलिए उसने इस सृष्टि की रचना की जिससे वह अपने आप से अपने आप को जना रहा है और वह सृष्टि के रूप में प्रगट हुआ। वेद में वर्णन आया है कि उसने सर्वप्रथम घोड़ा, गाय, आदि जीवों की रचना की लेकिन उसे संतोष नहीं हुआ। जब उसने मनुष्य की रचना की तब उसे प्रशन्नता हुई। उसकी प्रशन्नता का मुख्य कारण यह था कि उसमें बुद्धि की प्रधानता थी। वह अपनी बुद्धि के बल पर विचार के द्वारा सृष्टि के लेकर प्रकृति की रचना को जानने में समर्थ होकर उसके स्वभाव से लाभ उठा सकता है तथा विचार करके परमात्मा से एक होकर शान्त भाव से जैसे गंगा समुद्र में मिलकर समुद्र ही हो जाती है, वह स्वम परमात्मा स्वरुप हो सकता है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

वेदान्त दर्शन भाग-3

भारतीय संस्कृति वेदान्त प्राचीनकाल में रग-रग में समाया हुआ था। आज पाश्चात सभ्यता जो वेदान्त दृष्टि से अमानसिक है यानी हम सही मायने में मनुष्यता से पशुता की ओर भाग रहे हैं। पशु यानी जो यानी अपने शरीर के सुखों का ही ध्यान रखे। हमारा सिद्धांत था “वसुदेव कुटुंबकम” अर्थात सारी सृष्टि एक परिवार है। जागृत अवस्था में हम सृष्टि के दृष्टा हैं। सम्पूर्ण जागृत अवस्था जिसको हम अपनी इन्द्रियों से जान रहे हैं, उसके प्रकाशक हम हैं। वह मुझमें स्वप्न की तरह प्रतीत हो रही है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है “इदम शरीरं कौंते” अर्थात जो भी जागृत अवस्था में यह-यह करके जानने में आ रहा है, वह सब हमारा शरीर है यानी हम ही इसमें व्यापक हैं। यह व्यापकता ऐसी नहीं है कि जैसे एक लोहे का गोला अग्नि में डालो तब अग्नि लोहे के गोले में व्यापक होकर वह लोहा अग्नि की तरह व्यव्हार करने लगेगा। यह व्यापकता ऐसी है जैसे सोने के जेवर में आभूषण प्रतीती मात्र है। देखने में कंगन अलग है, हार अलग है, अँगूठी अलग है एवं कान के रिंग अलग हैं। इन सब आभूषणों का व्यव्हार अलग-अलग है लेकिन सब में एक ही सोना व्याप्त हो रहा है। सोने को निकाल दिया जाए तो आभूषण प्रतीती मात्र है। यदि वेदान्त के शब्दों में कहे तो सारी सृष्टि में एक आत्म चैतन्य ही व्यापक है।

प्रकृति द्वारा कल्पित पंचभूतों से यह सृष्टि प्रतीती मात्र है। यह अन्न, जल, अग्नि, वायु से निर्मित संसार एक ही चैतन्य तत्व में प्रतीत हो रहा है। वह तत्व सर्वत्र समस्त जीवों के अंदर आत्मा के रूप में व्यापक है। उसी के प्रकाश से प्रकाशित अन्तःकरण मन, बुद्धि, अहंकार, आदि जागृत अवस्था में मन के द्वारा चल रहा है। जब यह मन त्रिगुणात्मक संसार जो गुणों से बड़ा है तथा विषय ही इस संसार में आकर्षक फुलवारी है, इसकी ओर आकर्षित हो जाता है तब वह विषयी होकर संसार में जीव को भटकाने वाला होता है और जब यह साश्त्रानुसार चलता है तो वह जीव को आत्म चिंतन में लगाकर संसार से वैराग्य और समस्ती रूप परमात्मा से मनुष्य जीवन में जोड़ता है। मनुष्य जीवन में ही जीव के पास परमात्मा की दी हुई बुद्धि इतनी अधिक होती है कि वह चाहे तो अपने स्वरुप में स्थित होकर परमात्मा स्वरुप ही हो जाए और भौतिकता की ओर अगर जाता है तब वह कितना भी भटकता जाए लेकिन शान्ति के लिए उसे अमन होकर आत्म विचार ही करना पड़ेगा। इसीलिए प्राचीन समय में हम आपस में पत्र व्यवहार में लिखा करते थे कि आशा है आपके यहाँ भी अमन-चैन होगा, जिसका तात्पर्य था कि आपका जीवन में व्यवहार मन के अनुसार इन्द्रिय भोग के लिए नहीं बल्कि आवश्यकता की पूर्ती के साथ-साथ सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय ही होता होगा।

भारतीय दर्शन के अनुसार यदि हम विचार करके देखें और एक सूती रूमाल पर दृष्टि डालें तो उसमे हम देखेंगे कि पूरे रूमाल के अंदर सूत व्यापक है। सूत ही उसमे सत्य है, रूमाल की आकृति कल्पित है। इसी तरह से समस्त वस्त्र जिनको हम व्यवहार में लाते हैं उनमें सूत ही सत्य है वाकी कुर्ता-पजामा, साड़ी-ब्लाउज, आदि सब माया मात्र है। आगे विचार करें तो सूत भी कपास में कल्पित है। इसमें सत्य प्रतीत होने वाला कपास पृथ्वी से उत्पन्न हुआ जिसमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश यह पंचभूत ही व्यापक हैं। यह पंचभूत पंचतत्वों से निकले हैं एवं यह पंचतत्व महतत्व का विकास है। यह महतत्व अव्यक्त माया का खेल है जो परमात्मा का स्वभाव है। इसी का नाम माया व अविद्या है। इसी का नाम प्रकृति है। जिस प्रकार मनुष्य की प्रकृति मनुष्य से कभी अलग नहीं होती उसी प्रकार परमात्मा की प्रकृति परमात्मा से अलग नहीं होती। जिस प्रकार चैतन्य अनादि है उसी प्रकार से माया भी अनादि है। परमात्मा के ज्ञान से प्रकृति का अज्ञान निवृत्त हो जाता है। इसलिए यह अन्त वाली है। इसलिए इसको सःअन्त कहते हैं। अविद्या निकलने से हम इस संसार को स्वप्न की भाँती मिथ्या जान लेने पर संसार का सब व्यवहार करते हुए, सत्य तत्व की भ्रान्ति निकल जाने से इसके मोह जाल से मुक्त हो जाते हैं।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

वेदान्त दर्शन भाग-2

सृष्टि का आधार सत है और यह सत ही प्रकाशक है यानी वह चैतन्य है जो शरीर में आत्मा के नाम से जाना जाता है। वह स्मृति के रूप में मन बुद्धि आदि का साक्षी है। ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से विश्व को देखता है। इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त जानकारी के माध्यम से मन एवं अहंकार के अनुसार बुद्धि, निर्णायक की भूमिका निभाती है। इन्द्रियों की भूमिका भोगपरस्त होने पर भौतिकतावादी हो जाती है एवं गुरुमुख अर्थात शास्त्रानुसार होने पर अध्यात्मवादी होती है। अध्यात्मवादी ऋषियों का यह अनुभव है कि इन्द्रिय सुख से कभी तृप्ति होती नहीं ज्यों-ज्यों हम भोग करते हैं त्यों-त्यों भोग की अभिलाषा बढ़ती ही जाती है तथा इन्द्रियों के सामर्थ भी सीमित हैं व साधन भी सीमित हैं।

किसी भी इन्द्रिय सुख को आप ले लीजिये जैसे क्या आप भोजन लगातार कर सकते हैं तो आप एक सीमा तक ही भोग सकेंगे। इसी तरह से काम सुख आदि के बारे में विचार करना चाहिए। भोगने के पश्चात पुनः भोगने की इच्छा जागृत हो जाती है। इसके लिए भारतीय दर्शन कहता है कि विश्व की समस्त भोग सामग्री भी एक भोगी के लिए अपर्याप्त है। क्योंकि और-और की चाह कभी मिट ही नहीं पाती। इसीलिए मुनि ऋषि महापुरुषों ने कहा है कि भोग में सुख नहीं भोगो के त्याग में सुख है। भारतीय दर्शन कहता है कि खाने के लिए न जियो, जीने के लिए खाओ, इस प्रकार यह दर्शन वैराग्य प्रधान है।

अध्यात्म का अर्थ है कि चैतन्य सबके ह्रदय में आत्मा के रूप में अपरोक्ष है यानी उसको जान्ने के लिए हमें किसी इंद्री की आवश्यकता नहीं है। वह स्वम प्रकाश है। उसी से मन, बुद्धि, इन्द्रिय, आदि प्रकाशित हो रहे हैं। वही वैश्वानर के रूप में सब शरीरो में प्राण अपान आदि की क्रिया का संचालक है। वही चारों प्रकार का अन्न जो हम भक्ष यानी चबाकर खाते हैं, भोज्य यानी पेय के रूप में लेते हैं, लेह यानी चटनी की तरह इस्तेमाल करते हैं, चोस यानी चूस कर खाते हैं। इस सबका पचाने वाला भी वही परमात्मा है। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन की सारी प्रक्रिया जाने अनजाने में वही चला रहा है। वह हमारे अंदर साक्षी के रूप में हमारे मन बुद्धि का जाननेवाला है और कर्मों के अनुसार फलदाता यानी शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार हमें फल देता है जिससे हमारे सामने सुख एवं दुःख आते हैं। इसलिए उसे हम ईश्वर नाम से जानते हैं। वह स्वयं अकर्ता, अभोक्ता है। सारा काम उसी के प्रकाश में होता है। सारी प्रक्रिया प्रकृति यानी उसकी इच्छाशक्ति के द्वारा ही होती है। वह केवल प्रकाशक एवं साक्षी है।

मनुष्य, जीवन में जो कुछ भी करता है वह बुद्धि के द्वारा ही करता है। बुद्धिपूर्वक काम करने के कारण वह करता हो जाता है। करता होने के कारण उसे मनुष्य शरीर में किये कर्मों का फल अन्य योनियों में भोगना पड़ता है। यदि वह चाहे तो अपनी बुद्धि के द्वारा मनुष्य योनि में विचार करके केवल आवश्यकता की पूर्ति करते हुए और इन्द्रिय सुख पर नियंत्रण रखते हुए, विषयों से विरक्त होकर साक्षी भाव से अपना जीवन यापन करे तथा नवीन वासनाओं से निःसंकल्प रहते हुए कामना रहित होकर आत्म चिंतन करे, तब वह इन्द्रियों की पराधीनता से बचकर स्वतंत्र व आनंदमय रह सकता है। वह आनंद ही हमारा स्वरुप है। वासनाओं से मुक्ति ही मोक्ष है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज