- आत्मन् का बोध न होना ही सभी अनर्थों का हेतु है।
Author: śaṅkaradāsa
वेदोक्त दो धर्म — यात्रा वृत्तान्त

ईश्वर कृपा से गृहस्थ होते हुए भी वर्ष में एक बार एकल यात्रा हो जाती है। शिशिर ऋतु का मौसम मुझे अधिक भाता है, देवभूमि उत्तराखण्ड और भी शांत और रमणीय रहती है। अधिकांशतः मैं ऋषिकेश और उसके आस पास पहाड़ियों पर ही वेदान्त पाठ के साथ भ्रमण करता आया हूं किंतु इस बार नचिकेता ताल दर्शन की अभिलाषा हुई। महात्मा नचिकेता एक मुमुक्षु के लिए आदर्श हैं। इनका अनुकरण और इनके विषय में विशेषतः बच्चों को अवश्य प्रेरित करना चाहिए। तो इस बार टेहरी चंबा होते हुए पहले सेम नागराजा के दर्शन किए और वहाँ से नचिकेता ताल जो उत्तरकाशी के पास पड़ता है।
इस बार विचार चिंतन का आधार था ईशोपनिषद्। ईशोपनिषद् संक्षेप में किंतु गूढ़ अर्थ में वेदोक्त दोनों धर्मों के विषय में बताता है। इसके साथ साथ इनका पालन न करने के दुष्प्रभाव भी। एक मार्ग तो ज्ञान निष्ठा का है और दूसरा कर्म निष्ठा का। जिस आत्मज्ञ ने तीनों एषणाओं* का त्याग कर दिया है, उसके लिए तो निवृत्ति मार्ग है, और जो अनात्मज्ञ है उसके लिए प्रवृत्ति मार्ग। शोक और मोह के कारण व्यक्ति इन धर्मों का ठीक ठीक पालन नहीं कर पाता और पुनः पुनः अधोगति को प्राप्त होता है।
उत्तरकाशी में एक सुबह काशी विश्वनाथ के दर्शनार्थ पहुँचा। वहां एक माई ने पूछा कि साथ में कौन है, मैंने उत्तर दिया कि अकेला हूँ। पास बैठे एक साधु महाराज ने सुना और पूछा, “क्या सच में इकेला है? राम नहीं है तेरे साथ में?” उन्होंने आगे कहा, “वो ईश्वर सबमें व्याप्त है, सबके साथ है और वही सबको चला रहा है। तुम्हें भी!” ये सुनकर मुझे ज्ञान हुआ कि उपनिषद् में जो पढ़ा उसका ठीक ठीक अर्थ इन महात्मा जी ने समझा दिया। एक ज्ञाननिष्ठ महापुरुष के साक्षात दर्शन भी हो गए। कुछ समय उत्तरकाशी में बिताने के पश्चात मैं ऋषिकेश आ गया।

ऋषिकेश में एक भूतनाथ महादेव मंदिर है। मान्यता है कि जब महादेव बारात लेकर विवाह के लिए कनखल जा रहे थे तो भूतगणों को यहां ठहराया गया था। इस मंदिर में प्रसाद रूप में प्रत्येक सुबह चाय और थोड़े समय पश्चात बहुत स्वादिष्ट खिचड़ी मिलती है। यहां एक साधु बाबा से बात हुई। उन्होंने बताया कि कुछ कारण वश उन्हें गृहस्थ जीवन का त्याग करना पड़ा और फिर उन्होंने ज्ञान प्राप्ति के लिए कई अनुष्ठान किए, बहुत कष्टों का सामना करना पड़ा और उनका प्रयास अभी जारी है। इन महात्मा के दर्शन से मुझे आभास हुआ की बिना पूर्ण ज्ञान निष्ठा के कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए, अन्यथा कई कष्ट उठाने पड़ते हैं, क्योंकि ये वेदोक्त धर्म से भटकाव है।

अभी मेरी यात्रा पूर्ण नहीं हुई। ब्रह्मलीन हुए बिना पूर्ण होगी भी कैसे! भटकाव लगे रहेंगे और स्वयं को पकड़कर बारंबार योगपथ पर लगाना होगा। मेरे लिए प्रवृत्ति मार्ग है, निष्काम कर्मयोग — ईश्वर को समर्पित सभी कार्य और योगारूढ़ होने का निरंतर प्रयास। सबसे पहले एक विशुद्ध कर्मयोगी बनना होगा। मैं निरंतर प्रयासरत हूं और आप?
बढ़ाई पाने की होड़ में
न बनें खोखले विद्वान
योगपथ का अनुसरण कर
रखें गुरु का मान
प्रथम निष्काम कर्म
द्वितीय लगे तब ध्यान
तृतीय पनपे भक्ति
तुरीय है ज्ञान विज्ञान
—
*तीन एषणायें: वित्त (धन से आसक्ति), पुत्र (परिवार से आसक्ति), लोक (प्रसिद्धि से आसक्ति)
— शंकरदास