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स्वामी श्री हीरानन्द जी महाराज, संरक्षक/संचालक

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श्री श्री 1008 स्वामी हीरानन्द जी का जन्म 1 जनवरी 1960 को मध्य प्रदेश के भिण्ड जिले में हुआ। जुलाई 1980 में वे साधू होकर घर से निकल गए एवं 1982 में गुरु महाराज स्वामी श्री विश्वंभरानन्द जी से गुरु दीक्षा प्राप्त की। गुरु महाराज स्वामी श्री विश्वंभरानन्द जी से गुना, मध्य प्रदेश स्थित आश्रम में संन्यास ग्रहण किआ। श्री श्री 1008 स्वामी हीरानन्द जी 1987 से 1995 तक गुरु के चरणों में रहे एवं 1995 से वर्तमान में स्वामी श्री हीरानन्द जी श्री विश्वंभरानन्द संत आश्रम, झाँसी की देख-रेख में हैं।

“नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोइंतस्त्वनयो स्तत्वदर्शिभि।”

असत वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत का अभाव नहीं है।
इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषो द्वारा देखा गया है।

स्वामी श्री शुकदेवानन्द जी महाराज, प्रबन्धक

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स्वामी श्री सुकदेवानन्द जी का जन्म सन 1934 में ललितपुर जिले के सम्भ्रान्त ब्राह्मण परिवार में हुआ। गाँव में कोई प्राइमरी विद्यालय न होने के कारण प्रारंभिक शिक्षा गाँव के ही एक शिक्षक श्री द्वारका प्रसाद सिरोठीया जी द्वारा हुई। 1946 से आर0ऐस0ऐस0 के स्वम सेवक रहे जहाँ उनके जीवन पर गुरु माधव राव, सदा शिव राव गोलबेकर जी के जीवन से विशेष प्रभाव पड़ा। बिपिन बिहारी इण्टर कॉलेज से इण्टर करने के पश्चात लखनऊ से सिविल इंजीनियरिंग की। इंजीनियरिंग करने के पश्चात स्वामी जी ने 1965 तक पी डबलू डी में कार्य किआ। परन्तु नौकरी में मन न लगने के कारण नौकरी से त्यागपत्र देकर पैतृक कृषि का कार्य किआ।

1985 में स्वामी जी गुरु स्वामी विश्वंभरानन्द जी के संपर्क में आये एवं 1995 में संन्यास ग्रहण किआ तथा उनकी अंतिम आज्ञा, तुम्हे झाँसी में ही रहना है, का पालन करते हुए स्वामी जी अन्त तक श्री अखण्डानन्द संत आश्रम झाँसी में प्रबंधक के पद पर कार्यरत रहे। स्वामी जी माह दिसम्बर 2020 में ब्रह्मलीन हुये। स्वामी जी का कहना था

प्रत्येक मनुष्य की आंतरिक चाह सुख शान्ति पाना है जिसे वे बिना सतसंग के नहीं समझ पाते,
जिसका संछिप्त सूत्र है “Attach with the God and Detach from the World.”