वेदांत दर्शन भाग-14

परमात्मा सत्य है। यानी इस सृष्टि में केवल वही है। यह सारा विश्व उसका ही चमत्कार यानी उसी की महिमा का प्रकाश है। वह चेतन है। यानी वह सर्वज्ञ है। सब उसी से चल रहा है। कैसे यह संसार वह संचालित करता है और इस संसार में जिसकी सत्ता के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता है उस की प्रशासनिक व्यवस्था के विचार का नाम ही दर्शन है। उसकी वैज्ञानिक विचार का ही नाम दर्शनशास्त्र है। जिसके अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग नाम है इंग्लिश भाषा में उसको फिलॉस्फी कहते हैं। भारतीय दर्शन की जड़ें 1955885120 वर्ष पुरानी है। भारतीय मनुषी(जो मन का ईष (मालिक) है, जो मन की अधीन ना हो करके मन से सेवक की तरह अपनी सेवा तो लेता है लेकिन वह कभी उसके अधीन नहीं होता अर्थात जो अपनी बुद्धि के द्वारा मन को घोड़े की लगाम की तरह अपने हाथ में रखता है।) ने दर्शनशास्त्र का विचार आरण्य अर्थात वनों (जहां पर किसी प्रकार का रण अर्थात द्वंद यानी संसार के झंझट ना हो) मे किया। इसीलिए इन उपनिषदों को आरण्यक भी कहा जाता है। गीता जो महाभारत जैसे बहुत बड़े महायुद्ध में मोह के वश हुए अर्जुन जैसे योद्धा को श्री कृष्ण जैसे जोकि साक्षात परमात्मा के अवतार थे गुरु ने सुनाई और उसको अंत में कहना पड़ा की मेरा मोह नष्ट हो गया है (नष्टोमोह) और मुझे अपने स्वरूप का ज्ञान हो गया है। अब मैं आपके वचनों का पालन करूंगा। यह अपवाद के रूप में है गीता को कुछ विद्वान स्मृति ग्रंथ कहते हैं एवं कुछ लोग इसे अंतिम उपनिषद भी कहते हैं। अधिकांशतः गीता की मान्यता एक स्मृति ग्रंथ के रूप में ही है और यह प्रस्थानत्रे का मुख्य ग्रंथ है। प्रस्थानत्रे मैं ब्रह्म सूत्र उपनिषद और गीता प्रधान है।

भारतीय दर्शन के अनुसार परमात्मा जिसे हम सच्चिदानंद कहते हैं वह सृष्टि के समस्त जीवो में आत्मा के रूप में आकाशवत् व्यापक है। यह व्यापकता जैसा कि पहले कहा जा चुका है जेवर में सोने की तरह होती है। परमात्मा का प्रकाश प्रकृति के कार्य अंतः करण में पड़ता है यह अंतःकरण ही पिछले दृष्टांत में बताया गया मिरर है। इस अंतः करण से ही प्रतिबिंबित होकर यह बुद्धि के रूप में प्रतिभाषित होकर के सारा व्यवहार करता है। इस व्यवहार को अज्ञानी जीव मनुष्य अपनी बुद्धि का चमत्कार मानता है और समझदार मनुष्य इसे परमात्मा की कृपा मानता है जो परमात्मा की कृपा मानता है वह भक्त है। जो अपनी आत्मा को परमात्मा स्वरुप अनुभव करता है, वह ज्ञानी है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज