वेदांत दर्शन भाग-13

श्रुति भवति का कथन है कि यह आत्मा ही ब्रह्म है। श्रुति ज्ञान को अपना अनुभव बना लेती है। यह संसार ब्रह्म चैतन्य में प्रतीति मात्र है। संत महापुरुष उदाहरणों के द्वारा समझाया करते हैं जैसे एक बार कुछ चिड़िया दाना चुग रही थी उसी समय एक शरारती बालक एक शीशा (मिरर) लेकर आया और उसने वह शीशा इस तरह से घुमाया सूर्य की रोशनी शीशे पर पड़े तथा उसकी परछाई को उसने पक्षियों पर डाला और उस परछाई से पक्षी भाग गए। पक्षियों ने भागकर आपस में विचार किया कि हमें किसने भगाया। किसी ने कहा कि बालक ने भगाया किसी ने कहा सूरज की रोशनी ने भगाया। उन पक्षियों में एक बूढ़ा पक्षी जो कि अनुभवी था उसने कहा कि ना तो बालक ने भगाया क्योंकि ना तो बालक ने ताली बजाई और ना ही बालक ने कोई हमें पत्थर लाठी मारी फिर भी हम भागे। इसी प्रकार सूर्य की सीधी रोशनी भी हमारे ऊपर नहीं आई हम धूप में भी नहीं थे फिर भी हमारे ऊपर रोशनी की चमक पड़ी। उसी चमक से हमें भागना पड़ा। यह परछाई कहां से आई? वास्तव में सूर्य की परछाई शीशे पर पड़ी और उस पर छाई का बालक निमित्त बना और उस परछाई के द्वारा ही हमें भागना पड़ा। इसमें सूर्य को किसी प्रकार का कोई प्रयोजन ही नहीं वह पूर्ण रूपेण अकर्ता ही है।

उपरोक्त उदाहरण पर विचार करें तो हमारी आत्मा जो आकाशवत हमारे अंदर है। वह आकाश से भी सूक्ष्म है। जैसे सब आकाश में ही प्रतीत हो रही है उसी प्रकार आकाश की भांति ब्रह्म से एक है। वह ब्रह्म हमारे अंदर आत्मा के नाम से जाना जाता है। आत्मा अकर्ता है इसलिए इसको कूटस्थ कहा है। यह चैतन्य है जाना इसका स्वभाव है। यह स्वयं प्रकाश है। जैसे हीरा स्वयं प्रकाश होता है अथवा सूर्य स्वयं प्रकाशित हो रहा है। इसी प्रकार आत्मा सबके अंदर स्वयं प्रकाश साक्षी के रूप में विद्यमान है। यह सूर्य की भी आत्मा है। सूर्य में इससे प्रकाशित हो रहा है। हीरा की भी यही आत्मा है। इस सृष्टि में जो कुछ भी है वह सत् ब्रह्म ही है जो सबकी आत्मा है। अलग-अलग वस्तुओं में वह उस वस्तु की विशेषता के रूप में वही प्रकाशित हो रहा है। जैसे सूर्य में उष्णता उसी की है तथा चंद्रमा में शीतलता वही है। मिर्च में तीक्ष्णता भी वही है। तू गन्ना में मधुरता के रूप में वही परमात्मा अथवा आत्मा है। जल में रस वही है तो अग्नि में उष्णता भी वही है। वायु में शक्ति वही है पृथ्वी में गंध वही है।

उसी परमात्मा का प्रकाश हमारे अंदर मन के रूप में चंद्रमा है। बुद्धि के रूप में सूर्य है। अहंकार रूप से रुद्र है। अंतः करण में जब चेतना फुरती है तो यह फुरना ही चित्त कहलाती है। यह संकल्प विकल्प करने से मन कहलाने लगती है। इस प्रकार यह मन बुद्धि चित्त अहंकार ही चतुर्मुख ब्रह्मा है।

आत्म चैतन्य ही सर्वव्यापी ब्रह्मचैतन्य है। जब जागृत अवस्था में यही ज्ञानेंद्रियों के द्वारा सृष्टि का अनुभव करता है तथा अपने स्वरूप की विस्मृति के कारण यह कर्ता समझता है इसीलिए भोक्ता बनना पड़ता है। जब यह अपने को अकर्ता, भोक्ता साक्षी जानता है तब वह सारी सृष्टि का प्रकाशक होने के बाद भी अकर्ता ही रहता है। वही मैं स्वप्न में क्षीण वासनाओं के कारण चित्तवृत्ति के द्वारा तरह तरह के दृश्य बिना इंद्रियों के अनुभव करते हैं। इसी अनुभव का नाम स्वप्न है जिसे हम जागने पर मिथ्या कह देते हैं।

सुषुप्ति में हमारी इंद्रियां एवं अंतःकरण घना अवस्था (sound sleep) में होने के कारण अचेतन अवस्था में होते हैं तब हमारा नाम प्राग होता है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

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