वेदांत दर्शन भाग-12

सारी सृष्टि में परमात्मा ही व्याप्त है। जिस प्रकार से इस शरीर में आत्मा जो कि हम “मैं” के रूप में अनुभव करते हैं। यह मैं इस शरीर में राजा की तरह व्यापक है। जैसे राजा एक प्रशासनिक तंत्र के द्वारा अपने विशाल साम्राज्य पर नियंत्रण रखता है। इसी प्रकार हमारा मैं आत्मा सारे शरीर की अंदर बाहर की गतिविधियों का साक्षी रहता है और अकर्ता रहते हुए भी सबका नियामक होता है। यह साक्षी आत्मा, कूटस्थ, दृष्टा, अादि नामों से जाना जाता है। यह साक्षी ब्रह्म ही है। जो आकाश की तरह जैसे आकाश में ही सारी सृष्टि व्याप्त है उसी तरह से यह ब्रह्म चैतन्य हमारे अंदर सूक्ष्म रूप से व्याप्त है। यह ब्रह्म इस सारी सृष्टि का आधार है। यह ब्रह्म ही जागृत अवस्था में वैस्वानर अथवा विश्व के नाम से जाना जाता है। यही ब्रह्म चैतन्य स्वप्न अवस्था में तेजस कहलाता है। जिस प्रकार से हम अपनी प्रयोगशाला में नए-नए प्रयोग करते रहते हैं और उन प्रयोगों का आनंद भी लेते हैं। इसी प्रकार स्वप्न में हम अपनी चित्तवृत्ति के द्वारा इन प्रयोगों में व्यस्त रहते हैं। जिस समय हम स्वप्न अवस्था में जाते हैं उस समय हम अपनी जागृत अवस्था को अपने में लीन कर लेते हैं अथवा हम इसी बात को इस प्रकार भी कह सकते हैं कि हमारी यह स्वप्न अवस्था जागृत को अपने में लीन कर लेती है। इसीलिए हमें स्वप्न में जागृत की स्मृति नहीं रहती है तथा स्वप्न अवस्था में जो कुछ भी हम देखते हैं वह केवल चित् वृत्ति की प्रवृत्ति ही होती है। वहां कुछ भी ना होते हुए सारी रचना एक वृत्ति का ही विलास है। वहां यथार्थ में कुछ भी नहीं है लेकिन जैसे हम जागृत अवस्था में अपनी परिस्थिति से सुखी दुखी होते हैं ठीक वैसे ही स्वप्न में सुख दुख का अनुभव करते हैं। यदि हमारी तुरंत ही निद्रा टूट जाए तो हम फिर जागृत में आ जाते हैं। जागृत में आकर के कहते हैं कि सब मिथ्या था लेकिन यह भी तो नहीं कह सकते कि हमने नहीं देखा था क्योंकि जैसा हम जागृत में अपनी इंद्रियों से देखते हैं ठीक वैसा ही हमने वहां अनुभूति की है।

जिस प्रकार एक विद्यार्थी के लिए गणित के 1 प्रश्न में कुछ दिया हुआ रहता है और जो दिया है उसके आधार पर वह जो आगे का हल निकालता है इसी प्रकार से हमारे सामने जो कुछ हमने देखा वह मात्र अवस्था बदलने से मिथ्या हो गया। तब क्या जो कुछ हम इंद्रियों से देख रहे हैं वह भी तो मिथ्या नहीं। यह प्रश्न एक जिज्ञासु के सामने स्वतः खड़ा हो जाता है।

इसी प्रकार एक बार राजा जनक अपने महल में सो रहे थे और उन्होंने एक सपना देखा कि उनके ऊपर एक शत्रु राजा ने चढ़ाई कर दी और वह युद्ध में अपने शत्रु से पराजित होकर युद्ध क्षेत्र से भाग रहे हैं उनकी सारी सेना तितर-बितर हो गई है और उनको जान बचा कर भागते भागते पूरे 3 दिन हो गए। तीसरे दिन वह गंगा किनारे एक अन्न क्षेत्र की शरण में पहुंचे और वहां पर उनको खिचड़ी प्राप्त हुई तथा वह खिचड़ी उन्होंने एक झाड़ी के किनारे रखकर नदी में स्नान करने लगे। इतनी ही में दो सांड आपस में लड़ते हुए वहां आ पहुंचे और उनके द्वारा वह खिचड़ी फैल गई। उस से दुखी होकर उनको आंसू आ गए तथा ऐसी ही दुखद अवस्था में जब उनकी नींद टूटती है तब वह क्या देखते हैं की मैं तो यह अपने महल में बिस्तर पर लेटा हूं और यहां पर ना कहीं गंगा है ना ही सांड। यह तो केवल स्वप्न मात्र था जो मैं सोते में देख रहा था। अब वह एक सच्चे जिज्ञासु की तरह विचार करने लगे कि यह सत्य है या वह सत्य था? अब इस समस्या को हल करने के लिए उन्होंने बड़े-बड़े विद्वानों का सम्मेलन बुलाया लेकिन समस्या नहीं सुलझी। जब अष्टावक्र जी जो शरीर से आठ जगह से टेढे थे। इसीलिए उनका नाम अष्टावक्र था। जब वह जनक जी के सामने आए और उन्होंने कहा कि ना जाग्रत सत्य है ना ही स्वप्न सत्य है। सत्य तो केवल आत्मा ही है जो सूक्ष्म रूप से सर्वत्र है। उसी में सारी सृष्टि समुद्र में लहरों की तरह प्रतीति मात्र है। जैसे समुद्र में बड़ी सी बड़ी सुनामी आदि लहरें जल के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। सहारा समुद्र हमें छोटी और बड़ी लहरों अथवा शांत समुद्र के रूप में ही दृष्टिगोचर होता है चाहे वह शांत हो अथवा लहर के रूप में हो वह जल के अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं है। चाहे उस समुद्र का एक लोटा जल हो अथवा एक झील या सागर का एक हिस्सा हो है सब जल ही। इसी प्रकार से वह ब्रह्म ही आत्मा के रूप में किसी शरीर में हो अथवा बिना शरीर का हो सर्वत्र ब्रह्मा ही है। सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवाणु से लेकर हाथी घोड़े मनुष्य सूर्य चांद ब्रह्मा विष्णु महेश आदि देवता सभी रूपों में वही ब्रह्म व्यापक है। सीटी से लेकर ब्रह्मा विष्णु महेश तक सब उपाधियां ब्रह्म में ही कल्पित हैं। जैसे एक ही मनुष्य में पिता पुत्र पति अथवा बहन भाभी माता पत्नी तथा अध्यापक लिपिक मंत्री अफसर आदि उपाधियां कुछ भी हो लेकिन वह मनुष्य ही है। इसी प्रकार से सारी सृष्टि ब्रह्म (सच्चिदानंद) ही ईश्वर उपाधि से अपनी प्रकृति के द्वारा चला रहा है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

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