वेदान्त दर्शन भाग-7

वेदान्त जीवन जीने की एक कला है। मनुष्य को यह योनि परमात्मा की सबसे बड़ी कृपा है। अनंत मनुष्य योनिओं में जो हमारे अंदर वासनाओं के संस्कार भरे हुए होते हैं। उन समस्त संस्कारों को अपने पुरुषार्थ से पूरी तरह निकाल करके निर्वासनिक, कामना रहित होकर अपने मूल तत्व से एक हो सकते हैं। देखने में यह संसार पीपल जिसे संस्कृत में अश्व कहा गया है। यानी अश्व (घोड़ा) की तरह चलता ही रहे और कुछ न कुछ गंदगी भी निकालता रहे और इस पर सवार होने वाला व्यक्ति जरा सा भी असावधान हो तो वह अपने हाथ पैर भी तुड़बा ले, उसे पीठ से भूमि पर आने में विलम्ब नहीं लगेगा और यदि इसका सवार पूरी तरह सावधान हो तो यह उसे अपने गंतव्य स्थान पर भी पहुंचा देगा। अर्थात यह जीव मनुष्य योनि में ही अपने जीवन के लक्ष्य आनंद में स्थित हो सकता है।

यह अश्वत वृक्ष कैसा है? गीता अध्याय 15 के अनुसार इसकी जड़े आकाश में हैं। शाखाए नीचे हैं। विचार करने की चीज है की वृक्ष भूमि में ही हो सकता है। आकाश में वृक्ष संभव ही नहीं है। इसका तात्पर्य यह है कि यह संसार केवल अज्ञान से ही प्रतीत हो रहा है, पर है नहीं। केवल दृश्य मात्र है। इसके सारे सम्बन्ध माने हुए हैं इसीलिए यह असंघता रुपी शस्त्र से कटने वाला है। यह संसार अविद्या से प्रतीत हो रहा है।

परमात्म तत्व की शक्ति का अनुभव हमें दो रूपों में होता है। एक विद्या दूसरी अविद्या। परमात्म तत्व का अनुभव कराने वाली शक्ती का नाम विद्या है और यह परमात्म तत्व समस्त जीवों में रहने वाला ईश्वर ही है। इसी को हम आत्मा के रूप में जानते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि जीव को अपने स्वम की पहचान करने वाली शक्ती का नाम विद्या है।

जीव परमात्मा का ही अंश है लेकिन वह अज्ञान के कारण अपने आप को भूल चूका है। यह अज्ञान ही अविद्या अर्थात माया, आदि नामों से जाना जाता है। यह संसार माया अर्थात अविद्या से ही प्रतीत हो रहा है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

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