मनुष्य शरीर में अन्य शरीरों से कुछ विलक्षणतायें हैं जैसे राग, द्वेष, मोह, ममता, आदि। इनमे से संतान के प्रति ममता-मोह पशु पक्षियों, आदि योनियों में भी रहता है लेकिन यह थोड़े समय के लिए ही होता है, जब तक संतान अपना पेट भरने में सक्षम न हो जाए किन्तु मनुष्य योनि में ममता, मोह, राग, द्वेष, वितृष्णा, लोकेष्ण, पुत्रेष्णा, आदि दोष हैं जो जीवन पर्यन्त रहते हैं। इन पर नियंत्रण करने के लिए मनुष्य को परमात्मा ने पर्याप्त बुद्धि प्रदान की है। हमारे ऋषि मुनियों ने आत्म चिंतन करके इस समस्या के हल के लिए हमारे समाज को वेदों के रूप में तथा धर्मशास्त्र एवं स्मृति ग्रंथों के रूप में अपना चिंतन रखा। जिससे की मनुष्य का जीवन एक अनुशासित समाज के रूप में रहे। किसी भी देश अथवा समाज के लिए उपयोगी, शिक्षित व विचारशील व्यक्ति ही होता है। विचार करके देखें तो दशरथ पुत्र राम, भरत, शत्रुघ्न, आदि का इतना उच्च जीवन बनाने में यही ऋषि मुनियों का साहित्य है। जिसे हम मनुस्मृति, गीता एवं उपनिषदों के रूप में पाते हैं।
यह स्मृतिग्रन्थ चाहे मनुस्मृति हो अथवा गीता। हम विचार करके देखें कि समस्त शास्त्रों में एक ही सिद्धांत को तरह-तरह से प्रतिपादित किया गया है। वह सिद्धांत यह है कि एक ही सत तत्व समस्त सृष्टि में और वह तत्व चैतन्य है। इसी वजह से वह सर्वज्ञ है तथा सर्वज्ञ होने से सर्वेश्वर भी वही है तथा समस्त शरीरों में आकाशवत आत्मा के रूप में विद्यमान है और प्रत्येक शरीर में अलग-अलग मालुम होते हुए भी वह आत्मा के रूप में सर्वेश्वर है। समस्त योनि का कारण ईश्वर है। यही परमात्मा का अंश है। यह एक शरीर का ही दृष्टा न होकर के साड़ी सृष्टि का दृष्टा परमात्मा है, जिसको हम मैं कहते हैं। वह एक ही शरीर का मैं नहीं है वह समस्त शरीरों में मैं के ही नाम से जाना जाता है। उसी मैं को हम सामने वाले से आप या तुम कहते हैं और जो हमसे अदृष्ट है उसे वह कहते हैं। लेकिन यह समस्त नाम एक ही तत्व के हैं जो और सबमे वह आत्मा के रूप में विद्यमान है। इस प्रकार से यह शरीर अगणित कीटाणुओं का समूह मात्र है। इसी प्रकार यह विश्व विराट रूप में जीवों का समूह एक ही शरीर है। यही सोच ऋषि-मुनियों ने शास्त्रों में अपने विचार के रूप में रखी है। इन शास्त्रों के विचारों को जो व्यक्ति गुरु एवं शास्त्रों पर श्रद्धा रखते हुए श्रवण तथा मनन एवं चिंतन करेगा उसके जीवन में यह उतरेगा। मनुष्य के जीवन में जो नैसर्गिक दोष जैसे राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद-मत्सर, आदि विद्यमान रहते हैं उन पर विजय पा सकता है।
उपरोक्त समस्त दोष स्वाभाविक रहते हुए भी विचारवान जागृत पुरुष को यह हानि नहीं पंहुचा सकते बल्कि उनके यह अस्त्र-शास्त्र बनकर रहते हैं। ऐसे विचारवान पुरुषों में ही दशरथ पुत्र राम को एक आदर्श पुरुष के रूप में बाल्मीकि जी ने प्रस्तुत किया। वह अपनी धर्मनिष्ठा के कारण ही मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये तथा उनके छोटे भाई भरत एवं माता कौशल्या तथा सुमित्रा, सीता, आदि ने अपना-अपना आदर्श रखा और ये युग-युगांतर से आज भी हमारे सबके लिए आदर्श बने हुए हैं और बने रहेंगे।
स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज