वेदान्त दर्शन भाग-5

परमात्म तत्व अद्वितीय है अर्थात वह सब रूपों में जैसे समुद्र की समस्त छोटी बड़ी लहरों आदि के रूप में जल ही है। जल कहो अथवा समुद्र कहो सभी रूपों में एक ही जल लहर, बुलबुला आदि के रूप में प्रतीत हो रहा है। प्रत्येक लहर अलग-अलग है और वह अपना अलग अस्तित्व रखती है व बनती मिटती है तथा शान्त हो जाती है किन्तु पानी से कोई भी लहर भिन्न नहीं है, जैसे महासागर में पानी से भिन्न कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार इस संसार रुपी भवसागर का जल यह तत्व ही है, जो सृष्टि के रूप में प्रतीत हो रहा है, जिसमे अनेका-अनेक ब्रह्माण्ड रुपी भवसागर हैं। जिनकी गणना असम्भव है।

इस सृष्टि में परमात्मा ने मनुष्य को बुद्धि इतनी दी है कि वह आत्म चिंतन करके सब कुछ परमात्मा के रूप में जानकर संसार का सब व्यवहार करते हुए व संसार से विरक्त रहते हुए व अपने समस्त कर्तव्यों का पालन करते हुए आनंदमय स्थित रह सकता है और उसका कोई भी द्वन्द यानी सुख-दुःख, मान-अपमान, मिलना-बिछुड़ना यह सब द्वन्द सहज ही लगेंगे। जैसे लहर ये जान जाए कि हम पानी हैं और वायु अथवा पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण हम में लहरें बन रही हैं व बिगड़ रही हैं लेकिन हम तो जल हैं तथा हमारे जल होने में कोई अंतर नहीं पड़ रहा चाहें हम ऊँचे उठे अथवा नीचे गिरें, लहर बनें अथवा शांत रहें, हमारा जल का स्वरुप बनने व बिगड़ने वाला नहीं है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण भारतीय इतिहास में रामायण के प्रमुख पात्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न एवं माता कौशल्या, सुमित्रा, आदि ने प्रस्तुत किया। यदि हम इन पात्रों की परिस्तिथि पर चिंतन करें तो हम देखते हैं कि राम एक सम्राट के पुत्र हैं और जनता में उनकी लोकप्रियता चरम सीमा पर है तथा पिता को अत्यंत लाड़ले भी हैं और सब तरह से सुयोग्य हैं। पिता ने अपनी छोटी पत्नी से वचनवद्ध होने के कारण इनको ऐसे समय वनवास की घोषणा की जब वह प्रातःकाल राम को युवराज के पद पर आसीन करने जा रहे थे। लेकिन राम को ऐसी विपरीत घोषणा से कि मुझे 14 साल का वनवास और मेरे छोटे भाई को युवराज का पद दिया जा रहा है, कुछ भी फर्क नहीं पड़ा और उन्होंने उस आज्ञा का पालन ऐसे ही किया जैसे युवराज की गद्दी को स्वीकार किया था।

इधर जब राम के वन गमन के बाद दशरथ ने राम का वियोग न सहने के कारण प्राणो का परित्याग कर दिया तथा भरत को जब ननिहाल से बुलाकर राजगद्दी देने का यह कहकर राज्याभिषेक करने का प्रस्ताव किया कि आपको राजा ने उत्तराधिकारी बनाया है तथा राम लक्ष्मण यहाँ है नहीं। इसलिए आपका कर्त्तव्य हो जाता है कि आप राज्य को संभालें। भरत के मना करने पर गुरु वशिष्ठ जी ने भी कहा कि आपकी इच्छा राज्य करने की नहीं है तो आप राम के लौटने पर उन्हें गद्दी सौंप दें लेकिन उस समय तक आप पिता की आज्ञा समझकर गद्दी को स्वीकार कर लें। लेकिन भरत ने अपने स्वम के विवेक को प्रधानता देते हुए राम को अयोध्या लौटा कर उन्ही को गद्दी देने का प्रस्ताव रखा और सम्राट के पद से विरक्त रहे।

जब चित्रकूट से राम ने वापस आना स्वीकार नहीं किया तब भरत ने राम की ही खड़ाउओं को राज सम्राट की गद्दी पर विराजमान करके स्वम विरक्त रहकर साधू जीवन जीते हुए अयोध्या के राज्य को संभाला ही नहीं बल्कि पहले से राज्य का प्रत्येक भाग जैसे सेना और कोष आदि इन सबको किसी को दोगुना व ढाईगुना बढ़ाकर के राम को 14 साल बाद हस्तांतरित किया। इससे यह प्रमाणित हो गया कि योग्यता भरत में राम से काम नहीं थी लेकिन वह वंश परंपरा को कायम रखकर राम को ही उन्होंने गद्दी पर बैठाला तथा स्वम जनता के सेवक बनकर सेवा की।

राम जब लंका विजय करके सम्राट के पद पर आसीन हुए तब उन्होंने 8 राज्यों की स्थापना की और स्वम को सेवक बनाकर के रखा तथा प्रजा का पुत्रवत पालन किया तथा प्रत्येक भाई के 2-2 पुत्र भी हुए। इस प्रकार संसार के समस्त कार्य करते हुए भी उनको शास्त्रों ने मर्यादा पुरुषोत्तम की उपाधि से विभूषित किया तथा वाल्मीकि जी ने राम को साक्षात धर्म का विग्रह माना। कहने का तात्पर्य कि संसार में रहते हुए संसार को मिथ्या समझकर अपने कर्तव्यों का पालन करो। ईशादि उपनिषद का पहला ही मन्त्र है – “ईशावास्य इदं सर्वं” उसका त्याग पूर्वक पालन करो। धन के लिए गिद्ध मत बनो।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

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