भारतीय संस्कृति वेदान्त प्राचीनकाल में रग-रग में समाया हुआ था। आज पाश्चात सभ्यता जो वेदान्त दृष्टि से अमानसिक है यानी हम सही मायने में मनुष्यता से पशुता की ओर भाग रहे हैं। पशु यानी जो यानी अपने शरीर के सुखों का ही ध्यान रखे। हमारा सिद्धांत था “वसुदेव कुटुंबकम” अर्थात सारी सृष्टि एक परिवार है। जागृत अवस्था में हम सृष्टि के दृष्टा हैं। सम्पूर्ण जागृत अवस्था जिसको हम अपनी इन्द्रियों से जान रहे हैं, उसके प्रकाशक हम हैं। वह मुझमें स्वप्न की तरह प्रतीत हो रही है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है “इदम शरीरं कौंते” अर्थात जो भी जागृत अवस्था में यह-यह करके जानने में आ रहा है, वह सब हमारा शरीर है यानी हम ही इसमें व्यापक हैं। यह व्यापकता ऐसी नहीं है कि जैसे एक लोहे का गोला अग्नि में डालो तब अग्नि लोहे के गोले में व्यापक होकर वह लोहा अग्नि की तरह व्यव्हार करने लगेगा। यह व्यापकता ऐसी है जैसे सोने के जेवर में आभूषण प्रतीती मात्र है। देखने में कंगन अलग है, हार अलग है, अँगूठी अलग है एवं कान के रिंग अलग हैं। इन सब आभूषणों का व्यव्हार अलग-अलग है लेकिन सब में एक ही सोना व्याप्त हो रहा है। सोने को निकाल दिया जाए तो आभूषण प्रतीती मात्र है। यदि वेदान्त के शब्दों में कहे तो सारी सृष्टि में एक आत्म चैतन्य ही व्यापक है।
प्रकृति द्वारा कल्पित पंचभूतों से यह सृष्टि प्रतीती मात्र है। यह अन्न, जल, अग्नि, वायु से निर्मित संसार एक ही चैतन्य तत्व में प्रतीत हो रहा है। वह तत्व सर्वत्र समस्त जीवों के अंदर आत्मा के रूप में व्यापक है। उसी के प्रकाश से प्रकाशित अन्तःकरण मन, बुद्धि, अहंकार, आदि जागृत अवस्था में मन के द्वारा चल रहा है। जब यह मन त्रिगुणात्मक संसार जो गुणों से बड़ा है तथा विषय ही इस संसार में आकर्षक फुलवारी है, इसकी ओर आकर्षित हो जाता है तब वह विषयी होकर संसार में जीव को भटकाने वाला होता है और जब यह साश्त्रानुसार चलता है तो वह जीव को आत्म चिंतन में लगाकर संसार से वैराग्य और समस्ती रूप परमात्मा से मनुष्य जीवन में जोड़ता है। मनुष्य जीवन में ही जीव के पास परमात्मा की दी हुई बुद्धि इतनी अधिक होती है कि वह चाहे तो अपने स्वरुप में स्थित होकर परमात्मा स्वरुप ही हो जाए और भौतिकता की ओर अगर जाता है तब वह कितना भी भटकता जाए लेकिन शान्ति के लिए उसे अमन होकर आत्म विचार ही करना पड़ेगा। इसीलिए प्राचीन समय में हम आपस में पत्र व्यवहार में लिखा करते थे कि आशा है आपके यहाँ भी अमन-चैन होगा, जिसका तात्पर्य था कि आपका जीवन में व्यवहार मन के अनुसार इन्द्रिय भोग के लिए नहीं बल्कि आवश्यकता की पूर्ती के साथ-साथ सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय ही होता होगा।
भारतीय दर्शन के अनुसार यदि हम विचार करके देखें और एक सूती रूमाल पर दृष्टि डालें तो उसमे हम देखेंगे कि पूरे रूमाल के अंदर सूत व्यापक है। सूत ही उसमे सत्य है, रूमाल की आकृति कल्पित है। इसी तरह से समस्त वस्त्र जिनको हम व्यवहार में लाते हैं उनमें सूत ही सत्य है वाकी कुर्ता-पजामा, साड़ी-ब्लाउज, आदि सब माया मात्र है। आगे विचार करें तो सूत भी कपास में कल्पित है। इसमें सत्य प्रतीत होने वाला कपास पृथ्वी से उत्पन्न हुआ जिसमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश यह पंचभूत ही व्यापक हैं। यह पंचभूत पंचतत्वों से निकले हैं एवं यह पंचतत्व महतत्व का विकास है। यह महतत्व अव्यक्त माया का खेल है जो परमात्मा का स्वभाव है। इसी का नाम माया व अविद्या है। इसी का नाम प्रकृति है। जिस प्रकार मनुष्य की प्रकृति मनुष्य से कभी अलग नहीं होती उसी प्रकार परमात्मा की प्रकृति परमात्मा से अलग नहीं होती। जिस प्रकार चैतन्य अनादि है उसी प्रकार से माया भी अनादि है। परमात्मा के ज्ञान से प्रकृति का अज्ञान निवृत्त हो जाता है। इसलिए यह अन्त वाली है। इसलिए इसको सःअन्त कहते हैं। अविद्या निकलने से हम इस संसार को स्वप्न की भाँती मिथ्या जान लेने पर संसार का सब व्यवहार करते हुए, सत्य तत्व की भ्रान्ति निकल जाने से इसके मोह जाल से मुक्त हो जाते हैं।
स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज