वेदान्त दार्शन भाग – 1

भारतीय संस्कृति ऋषि मुनियों की देन है। इस प्रकृति के प्रबर्तक मुनि जिन्होंने मनुष्य जीवन पर मनन किआ माने गए हैं। इनको हम मुनि ऋषि आदि नामों से जानते हैं। जैसा की हम पहले कह आये हैं कि परमात्मा सबके ह्रदय में रहता है, वह ईश्वर है यानी सब पर शासन करने वाला तथा सर्वज्ञ है यानी सब कुछ जान्ने वाला है। ईश्वर कर्मानुसार फल मनुष्य योनि में देता है। मनुष्य योनि में बुद्धि प्रधान है। बुद्धि के सामने दो विकल्प स्पष्ट हैं :-

पहला प्रकृति यानी त्रिगुणात्मक माया द्वारा बनाया हुआ यह संसार जो तीनो गुणों के द्वारा बढ़ा है। इन तीन गुणों में सतोगुण जिसमे ज्ञान होता है, रजोगुण जिसमे क्रियायें होती हैं व तमोगुण जिसमे आलस्य, प्रमाद, इत्यादि का वास होता है। यह तीनों गुणों के द्वारा बढ़ा संसार, इसमें इन गुणों का भोग ही इन्द्रियों के लिए आकर्षण है। गीता में भगवान कृष्ण ने इस संसार को अश्वत वृक्ष की उपमा देकर कहा है “गुण प्रविद्या विषय प्रबालाः” इससे यह संसार बढ़ा है।

सतोगुण ज्ञान होता है इसीलिए यह विचार प्रधान है, जब मनुष्य बुद्धि से विचार करता है कि क्या यह संसार का भौतिक सुख वास्तविक सुख है, इससे कभी तृप्ति होती है क्या? जब तृप्ति नहीं होती होती तब शांति कैसे संभव है। इसलिए हम ऐसा उपाये करें जिससे हमारी नैसर्गिक चाह जो सुख की है वह मिले जिसे प्रत्येक जीव चाहता है। प्रत्येक मनुष्य की चाह है कि वह सदैव सुखी रहे तथा सर्बत्र रहे तथा किसी भी चीज़ से उसे दुःख न पहुंचे। इसी बात को हम वेदान्त के शब्दों में कहें तो प्रत्येक मनुष्य की चाह देशकाल वस्तु से अपरिछिन्न सुख की है। इस लक्ष्य के लिए सभी दौड़ रहे हैं और वह सुख अधिकांश मनुष्य प्रकृति के द्वारा बनाये हुए भौतिक संसार में खोजता है और वह कोई धन से, परिवार से तथा यश यानी नामवली से प्राप्त करना चाहता है। परन्तु अभी तक इन वस्तुओं से किसी की तृप्ति हुई नहीं। वास्तविक तृप्ति इन्द्रिय सुख से पलटकर निज स्वरुप को जान्ने में ही मनुष्य को शान्ति मिलती है। इस विचारधारा के प्रवर्तक भारतीय ऋषि मुनि हैं जिन्होंने एकांत में विचार करके अपने विचारों को अपने शिष्यों के सामने रखा और उससे भारतीय संस्कृति का निर्माण हुआ जिसे हम वेदान्त दर्शन कहते हैं।

वेदान्त दर्शन में जो सर्वव्यापी परमात्मा है वही सबके ह्रदय में रहकर मन, बुद्धि, आदि का प्रेरक है और वही गुरु रूप में अवतरित होकर अपनी आने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शक होता है। इसीलिए हम गुरु को साक्षात ईश्वर रूप से देखते हैं क्योंकि उसके ह्रदय में परमात्मा ही बोल रहा है और वह जो कुछ भी बोलता है अपने शिष्यों अथवा पुत्रों के हित में ही बोलता है। यहाँ पर स्पष्ट किआ जाता है कि वंश परम्परा भारत में दो तरह से मानी गई है एक नाद परम्परा यानी गुरु परम्परा दूसरी बिन्दु परम्परा जिसको पुत्र अथवा लड़का कहते हैं, लड़का इसलिए कहलाता है क्योंकि वह वंश परंपरा की कड़ी होता है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

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