वेदान्त दर्शन भाग-2

सृष्टि का आधार सत है और यह सत ही प्रकाशक है यानी वह चैतन्य है जो शरीर में आत्मा के नाम से जाना जाता है। वह स्मृति के रूप में मन बुद्धि आदि का साक्षी है। ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से विश्व को देखता है। इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त जानकारी के माध्यम से मन एवं अहंकार के अनुसार बुद्धि, निर्णायक की भूमिका निभाती है। इन्द्रियों की भूमिका भोगपरस्त होने पर भौतिकतावादी हो जाती है एवं गुरुमुख अर्थात शास्त्रानुसार होने पर अध्यात्मवादी होती है। अध्यात्मवादी ऋषियों का यह अनुभव है कि इन्द्रिय सुख से कभी तृप्ति होती नहीं ज्यों-ज्यों हम भोग करते हैं त्यों-त्यों भोग की अभिलाषा बढ़ती ही जाती है तथा इन्द्रियों के सामर्थ भी सीमित हैं व साधन भी सीमित हैं।

किसी भी इन्द्रिय सुख को आप ले लीजिये जैसे क्या आप भोजन लगातार कर सकते हैं तो आप एक सीमा तक ही भोग सकेंगे। इसी तरह से काम सुख आदि के बारे में विचार करना चाहिए। भोगने के पश्चात पुनः भोगने की इच्छा जागृत हो जाती है। इसके लिए भारतीय दर्शन कहता है कि विश्व की समस्त भोग सामग्री भी एक भोगी के लिए अपर्याप्त है। क्योंकि और-और की चाह कभी मिट ही नहीं पाती। इसीलिए मुनि ऋषि महापुरुषों ने कहा है कि भोग में सुख नहीं भोगो के त्याग में सुख है। भारतीय दर्शन कहता है कि खाने के लिए न जियो, जीने के लिए खाओ, इस प्रकार यह दर्शन वैराग्य प्रधान है।

अध्यात्म का अर्थ है कि चैतन्य सबके ह्रदय में आत्मा के रूप में अपरोक्ष है यानी उसको जान्ने के लिए हमें किसी इंद्री की आवश्यकता नहीं है। वह स्वम प्रकाश है। उसी से मन, बुद्धि, इन्द्रिय, आदि प्रकाशित हो रहे हैं। वही वैश्वानर के रूप में सब शरीरो में प्राण अपान आदि की क्रिया का संचालक है। वही चारों प्रकार का अन्न जो हम भक्ष यानी चबाकर खाते हैं, भोज्य यानी पेय के रूप में लेते हैं, लेह यानी चटनी की तरह इस्तेमाल करते हैं, चोस यानी चूस कर खाते हैं। इस सबका पचाने वाला भी वही परमात्मा है। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन की सारी प्रक्रिया जाने अनजाने में वही चला रहा है। वह हमारे अंदर साक्षी के रूप में हमारे मन बुद्धि का जाननेवाला है और कर्मों के अनुसार फलदाता यानी शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार हमें फल देता है जिससे हमारे सामने सुख एवं दुःख आते हैं। इसलिए उसे हम ईश्वर नाम से जानते हैं। वह स्वयं अकर्ता, अभोक्ता है। सारा काम उसी के प्रकाश में होता है। सारी प्रक्रिया प्रकृति यानी उसकी इच्छाशक्ति के द्वारा ही होती है। वह केवल प्रकाशक एवं साक्षी है।

मनुष्य, जीवन में जो कुछ भी करता है वह बुद्धि के द्वारा ही करता है। बुद्धिपूर्वक काम करने के कारण वह करता हो जाता है। करता होने के कारण उसे मनुष्य शरीर में किये कर्मों का फल अन्य योनियों में भोगना पड़ता है। यदि वह चाहे तो अपनी बुद्धि के द्वारा मनुष्य योनि में विचार करके केवल आवश्यकता की पूर्ति करते हुए और इन्द्रिय सुख पर नियंत्रण रखते हुए, विषयों से विरक्त होकर साक्षी भाव से अपना जीवन यापन करे तथा नवीन वासनाओं से निःसंकल्प रहते हुए कामना रहित होकर आत्म चिंतन करे, तब वह इन्द्रियों की पराधीनता से बचकर स्वतंत्र व आनंदमय रह सकता है। वह आनंद ही हमारा स्वरुप है। वासनाओं से मुक्ति ही मोक्ष है।

स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज

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