परमात्मा सत है इसलिए वह सर्वत्र है एवं सर्वज्ञ भी है तथा वह आनंदस्वरूप भी है इसलिए वह सच्चिदानंद के नाम से जाना जाता है। उसके अनेक नाम हैं जैसे परमात्मा, ईश्वर, अकालपुरुष, आदि इन्ही में उसका एक नाम ॐ भी है। ॐ का उच्चारण करने पर अ उ म से ओमकार शब्द बनता है। यह सृष्टि ओमकार स्वरुप ही है। इसमें प्रत्येक जीव की तीन अवस्थाएं होती हैं जागृत, स्वप्न व सुषुप्ति। जागृत अवस्था में उसे इन्द्रियों के माध्यम से संसार का ज्ञान होता है। यह ज्ञान, कानो से शब्द का ज्ञान, जिव्हा से स्वाद तथा नाशिका से गंध ज्ञान होता है। इन पाँचो ज्ञानेन्द्रियों से हमें 5 तरह का संसार प्रतीत होता है। यह ज्ञान मन की ही उपस्तिथि में होता है इसलिए मन को भी विद्यानो ने छठी इंद्री कहा है। प्रत्येक क्रिया कर्मेन्द्री से होती है। कर्मेन्द्रियों में हाथ, पैर, वाणी एवं दो अधोईन्दरी (गुदा एवं शिश्न) हैं। इस प्रकार ये इन्द्रियां मानी गयी हैं। इनकी मालिक बुद्धि है, लेकिन वह इंद्री नहीं है, इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त ज्ञान पर ही अपना निर्णय लेती हैं और बुद्धि तथा इन्द्रियां मिलकर ही संसार का व्यव्हार करती हैं।
यह बुद्धि प्रत्येक जीव में होते हुए भी मनुष्य में परमात्मा ने भरपूर दी है। अन्य जीव प्रकृति से बंधे हुए हैं, उनकी सारी क्रियायें स्वाभाविक व प्राकृतिक होती हैं लेकिन मनुस्य अपना सारा व्यव्हार बुद्धि के अनुसार करता हैं। गीता में भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कर्म का अधिकार मनुष्य को है तथा फल मैं देता हूँ। यहाँ यह समझने की चीज है कि कृष्ण अपने को शरीर मानकर नहीं बोल रहे, वह आत्मस्त होकर ईश्वर भाव से बोल रहे हैं। कृष्ण ने गीता में जो कुछ भी कहा है सब आत्मस्त होकर ही बोला है इसीलिए कहीं भी गीता में कृष्णावाद शब्द नहीं आया बल्कि भगवानवाच ही लिखा है। इसीलिए इस गीता का नाम भगवत गीता हुआ। क्योंकि गीता में भगवान् स्वम बोले हैं। गीता भगवान् की ही वाणी है।
अपने यहाँ संस्कृत साहित्य में कृष्णावतार एवं रामावतार की सर्वाधिक मान्यता है तथा इन दो अवतारों की उपासना भगवान् के रूप में अधिकांश भक्त करते हैं। इन दो अवतारों में राम के चरित्र को बाल्मीकि जी ने आदर्श पुरुष के रूप में प्रस्तुत किआ है और उनको मर्यादा पुरुषोत्तम संज्ञा लंका विजय से लौटने के पश्चात दी है। बाल्मिकी जी ने उनको साक्षात धर्म का विग्रह कहा है। कालांतर में लोगो ने उनको ईश्वर रूप में पूजते हुए पुरुषोत्तम यानी सबके हृदय में रहने वाले नारायणस्वरूप विष्णु के अवतार के रूप में जाना। लेकिन श्री कृष्ण के प्रत्येक कार्य अलौकिक हुए जैसे पूतना वध, यमलार्जुन उद्धार, नरकासुर, भयंकासुर, आदि का उद्धार, मथुरा में कुब्जा का उद्धार जिसके कारण उनका एक नाम कुब्जा विरोधी भी हुआ तथा गोबर्धन लीला, रास लीला, कंश वध इस प्रकार साड़ी लीलायें उनकी अलौकिक हैं। इसलिए उनको उनके जीवनकाल में ही साक्षात भगवान् समझते थे। युधिष्ठिर के राजसु यज्ञ में भीष्म पितामाह ने सर्वप्रथम उन्ही की पूजा करवाई। इस प्रकार से हम कहे सकते हैं कि भगवत गीता भगवान् की ही वाणी है और वह वेदांत का सार है।
इस प्रकार जागृत अवस्था में मनुष्य सारे का सारा कार्य अपनी बुद्धि से करता है व फल भगवान् देता है। मनुष्य के सामने कर्मों का विकल्प खुला हुआ है। वह संसार की ओर भी झुक सकता है एवं चाहे तो परमात्मा की ओर भी झुक सकता है। संसार की ओर झुकने पर वह भौतिक साधन संपन्न होकर हरिण्यकश्यप व हरिण्याक्ष की तरह विश्व विजयी बनकर भौतिक सुख संपन्न हो सकता है। हरिण्याक्ष का अर्थ है जिसकी निगाह स्वर्ण पर हो और हरिण्यकश्यप का अर्थ है कि जो हिरण अर्थात सोने पर ही जिसकी दृष्टि हो। भौतिक यानी संसार का चातुरी में आजतक कोई हरिण्यकश्यप से ज्यादा स्याना नहीं हुआ जिसने अपने को जीवित रखने के लिए बुद्धि के सारे उपाए कर लिए फिर भी वह जीवित नहीं रह सका। इसलिए आध्यात्मिक दृष्टि से वह मूर्ख माना गया और आध्यात्मिक दृष्टि से कलयुग के राजा पारीक्षित सबसे चतुर माने गए, जिन्होंने मरणासन्न व्यक्ति का क्या कर्तव्य है यह जानना चाहा। इस प्रकार यहाँ स्पष्ट हो जाता है कि सही दृष्टिकोण आध्यात्म दृष्टि ही है। मनुष्य के पास दो दृष्टियां हैं आध्यात्म व भौतिक इसमें भौतिक दृष्टि में भटकन एवं आध्यात्म दृष्टि में शान्ति मिलती है। इसका विस्तार अगले भाग में आएगा।
स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज