ईश्वर को हम अनेकों नाम से उसकी विशेषताओं के कारण पुकारते हैं जैसे परमात्मा, सच्चिदान्द, पुरुषोत्तम, अकाल पुरुष, सर्वान्तर्यामी, आदि सबके हृदय में आत्मा के रूप में रहने के कारण वह परमात्मा कहलाता है। इस सृष्टि में वह तत्व ही ऐसा है जिसका कभी तथा कहीं अभाव नहीं है। संसार की प्रत्येक वस्तु के रूप में वह मौजूद है, इसलिए वह वस्तु परछिन्न नहीं है और इसको इस प्रकार अनुभव करके मुनिऋषियों ने उसे देशकाल वस्तु से अपरिछिन्न कहा है तथा उसी को सत्य समझा है। वह सब जगह मौजूद रहता है और वह सब कुछ जानने वाला है। उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है इसलिए वह आनन्दस्वरूपत है।
संसार में भय दूसरे से ही होता है, जब उसके अतिरिक्त कोई दूसरा है ही नहीं तो वह आनंदस्वरूप है। इसलिए वह सच्चिदानंद कहलाता है। वह अशरीरी होकर सब शरीरों के रूप में व्यापक है। वह अकर्ता,अभोक्ता, अजन्मा होकर भी सभी शरीरों में व्याप्त है। प्रत्येक प्राणी का शरीर प्रकृति से बना हुआ है। प्रकृति यानी स्वभाव, तो प्रश्न उठता है कि किसका स्वभाव यह स्वभाव उसी का है। वह अकेला होने के कारण अपने को प्रकट नहीं कर सकता, दूसरा है नहीं जिसको वह प्रकट करे इसलिए वही संसार के रूप में प्रकट होकर अपने आप से अपने आप को देख रहा है। प्रकट होने पैर वह तीन विषेशताओं वाला त्रिगुणात्मक प्रकृति कहलाया। यह तीन गुण हैं :-
सतोगुण – जिसमें ज्ञान होता है।
रजोगुण – जिसमें क्रियायें होती हैं।
तमोगुण – जिसमें आलस्य, प्रमाद, लोभ, मोह, काम, क्रोध, आदि उत्पन्न होते हैं।
प्रकृति के इन तीन गुणों से समस्त सृष्टि व्यापक है। इस प्रकृति का एक रूप अव्यक्त है, जिस तरह परमात्मा अव्यक्त है उसी तरह यह भी अव्यक्त व अनादि है। जब व्यक्त होती है तब इसका नाम महतत्व हो जाता है। उसी को हम अपने शरीर में बुद्धि के रूप में देखते हैं। सब शरीरों में यह कसी न कसी रूप में रहती है। हम देखते हैं कि प्रत्येक पशु, पक्षी भूख लगने पर शरीर अनुसार अन्न को तलाश लेता है और शरीर को धुप, पानी, आदि से सुरक्षित स्थान को तलाशता है। यहाँ तक की पेड़, पौधे भी जहाँ से रौशनी आती है उसकी ओर झुक जाते हैं। पशु, पक्षी कोई घोसला बनता है, कोई चीटियों की तरह बिल बनाता है तो कोई सांप की तरह किसी किसी के बने हुए घर में घुसकर उन्ही को खा जाता है। सांप कभी बिल नहीं बनाता वह दीमक के द्वारा बनाई गई बामी में प्रविष्ट होकर उन्ही को खा जाता है। इसी बात को भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा है
“मया सृष्टम गुण कर्म विभाग सः”
असल में जैसे ब्रह्म अनादि है उसी प्रकार यह सृष्टि भी अनादि है, क्योंकि जब हम विचार करके देखते हैं कि बीज पहले है या वृक्ष पहले तो बीज वृक्ष से ही पैदा होता है बिना वृक्ष के बीज कहाँ से आएगा फिर सोचे कि वृक्ष कहाँ से आया तो वृक्ष भी बिना बीज के आ ही नहीं सकता तब यह प्रश्न अनिर्बाचनीय ही रह जायेगा। जिस प्रकार से परमात्मा अनादि और अनिर्बाचनिय है उसी प्रकार उसकी प्रकृति जिससे यह सृष्टि हुई है वह भी अनादि व अनिर्बाचनिय है। इस माया के विषय में वेद व्यास जी ने श्रीमद भगवत में लिखा है
“ऋतेअर्थ यत्प्रतीयेत न प्रतियेत चात्मनि
तद्धिघादात्मनो मायां यथा अद्भासो यथा तमाः।”
अर्थात जो हो नहीं वो दिखा दे व जो है उसको ढक दे। वह न होते हुए भी सब में व्याप रही है। जैसे आकाश में राहु केतु न होते हुए भी छायाग्रह रूप मर प्रतीत हो रहे हैं एवं गीता में भी श्री कृष्ण ने इस संसार को उर्धमूल आधासाखा कहा है। उर्धमूल का अर्थ है कि इसकी जड़ आकाश में है और ब्रह्मा, विष्णु, आदि के रूप से लेकर सारे संसार में इसकी शाखाएं व्याप्त हैं और यह अस्वथ वृक्ष(स्थानीय भाषा में पीपल) की तरह सदा क्रियाशील रहता है तथा इसको असंघता रुपी शस्त्र से मजबूती से काटने को कहा है।
“असंघ सस्त्रेण दृणेन चित्वा”
अब विचार करने की चीज है जिसकी जड़ आकाश में होगी वह क्या वृक्ष होगा। संसार में कोई भी वस्तु बनानी होगी या मिटानी होगी तो वह कर्म से ही बनेगी। जैसे घड़ा बनाना है तो मिटटी, कुम्हार, पानी, आदि चाहिए और फोड़ना होगा तो फोड़ने वाला चाहिए, लेकिन यह संसार तो असंघ होने से ही अलग/कट जाता है। इस प्रकार हम सहज समझ सकते हैं कि यह माया अनादि जरूर है परन्तु इसका अंत ज्ञान से होने के कारण यह स-अन्त भी है। इस प्रकार इस सृष्टि में केवल परमात्मा ही सत्य है उसके अतिरिक्त सृष्टि में जो कुछ भी है वह देशकाल वस्तु से अपरिछिन्न होने के कारण असत है व वह माया का कारी है तथा प्रतीत मात्र है।
स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज