भारतीय दर्शन उपनिषदों पर आधारित है। उप का अर्थ होता है निकट अथवा समीप, निः का अर्थ होता है पूर्णतया, षद का अर्थ होता है जो निकाल दे अथवा विदीर्ण कर दे अर्थात जो हमारे अंदर का अज्ञान है वो पूर्णतया निकाल दे। कुछ लोग उपनिषदो को आरण्यक भी कहते हैं क्योंकि यह अधिकांशतः अरण्य यानी जहाँ किसी प्रकार का कोई द्वंद नहीं अर्थात वन में बैठ कर ऋषि मुनियों ने जो आपस में सृष्टि के बारे में विचार किया।
किसी समय इन उपनिषदो की संख्या बहुत थी लेकिन मुग़ल काल में बहुत सा साहित्य शासकों ने जलवा दिया। मौजूदा समय में लगभग 1100 उपनिषद उपलब्ध हैं। इनमें 11 मुख्य हैं। उपनिषदीय ज्ञान का आधार है सत तत्व का विचार। हमारे ऋषि मुनियों ने विवेक करके यह अनुभव किआ कि इस सृष्टि का अधिष्ठान एक अक्षर तत्व है। अक्षर का अर्थ है जिसमें किसी प्रकार का छरण न हो। वह अक्षर तत्व ही अकाल पुरुष है। वह निराकार रूप से सब में व्यापक है। वह अजन्मा है और वही सारी सृष्टि में वर्फ में जल की तरह व्यापक है और वह जड़ में ही चेतन है यानी जानने वाला है। इसी लिये उसको सच्चिदानन्द कहा है। क्योंकि वह आनन्दस्वरूप स्वम प्रकाश है। उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित हो रहे हैं और वह अकर्ता अभोक्ता है और वह ओमकार के नाम से जाना जाता है।
विचार करके हम देखें तो सृष्टि में जितनी भी आकृतियाँ हैं, सारी बिंदु, रेखा और वृत्त के रूप में हैं। यदि हम देखें तो यह “अ” की ही आकृति है और किसी भी शब्द का उच्चारण “अ” के बिना नहीं होता। इसलिए हर एक भाषा में पहला अक्षर अ ही होता है। चाहें उसे “अ” कहें, “A” कहें अथवा “अलफ” कहें और “म” से उच्चारण बंद होता है।
इस सृष्टि में दो ही चीजें हैं नाम और रूप अर्थात शब्द और आकृति। अतः इस नाम रूपात्मक सृष्टि में परमात्मा ही व्यापक है। इस प्रकार हम आसानी से समझ सकते हैं कि परमात्मा ही सत है एवं वही चैतन्य है। वह सतचितानन्द सर्वव्यापी व सदैव है। अर्थात वह हर जगह, हर वस्तु में व हमेशा है। इसी लिए इसे अकाल पुरुष तथा अक्षर यानी ओमकार नाम से जानते हैं। वह अक्षर तत्व सर्वव्यापी होने से हमारे अंदर आत्मा के रूप में विराजमान है। अतः हम कह सकते हैं कि सच्चिदानन्द परमात्मा ही हमारी आत्मा अथवा हमारा असली “मैं” है और वही ईश्वर है। वही सबका प्रकाशक है। वह जागृत, स्वप्न व सुषुप्ति में सदैव हमारे प्रत्येक कार्यकलाप का जाननेवाला है। हम उसको साक्षी रूप से भी जानते हैं। वही हमारे मन, बुद्धि, आदि का प्रकाशक है। इसी लिये गीता में कहा गया है कि “हज़ारों सूर्यों के प्रकाश से बढ़कर हमारी आत्मा का प्रकाश है” इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वह साड़ी सृष्टि का प्रकाशक आत्मा के रूप में सर्वव्यापी चैतन्य ही है। इसी प्रक्रिया का नाम जीव और ब्रह्म की एकता है व जीव और ब्रह्म की एकता ही वेदान्त का मुख्य सिद्धांत है।
स्वामी श्री शुकदेवानंद जी महाराज